#अंतिम_जौहर और घसेरा के राघव बहादुरसिंह पर आक्रमण (फरवरी-अप्रैल, 1753 ई०)
पुरे विश्व के इतिहास में अंतिम जौहर अठारवी सदी में भरतपुर के जाट सूरजमल ने मुगल सेनापति के साथ मिलकर कोल के घासेड़ा के राजपूत राजा बहादुर सिंह पर हमला किया था। महाराजा बहादुर सिंह ने जबर्दस्त मुकाबला करते हुए मुगल सेनापति को मार गिराया। पर दुश्मन की संख्या अधिक होने पर किले में मौजूद सभी राजपूतानियो ने जोहर कर अग्नि में जलकर प्राण त्याग दिए उसके बाद राजा और उसके परिवारजनों ने शाका किया।
बात 1753 की है दिल्ली के पास हरयाणा के कॉल परगने पर राजा बहादुर सिंह राघव का कब्ज़ा कर दिया था वही पास के घोसड़ा किले पर राजा बहादुर सिंह जी राघव का राज था पूरी तरह से बेख़ौफ़ होकर बहादुर सिंह राज कर रहे थे और मुगलो से लगातर लोहा ले रहे थे लेकिन पास की मुग़ल सल्लनत को फूटी आँख नहीं सुहाते थे मुग़ल सेनापति वजीर सफदरजंग ने किसी भी तरह बहादुरसिंह को रस्ते से हटाने की सोची
तभी मुग़ल सेनापति का एक पत्र बहादुर सिंह को आता है जिसमे कौल दुर्ग से तोपे हटाने का फरमान होता है लेकिन बहादुर सिंह मुग़ल सत्ता को चुनौती के लिए बने थे प्रतिउत्तर में बहादुर सिंह ने मुगलो के कई क्षेत्र अपने कब्जे में ले लिए, मुगलो के थाने लूटने पर बहादुर सिंह राघव को भारी मात्रा में गोला बारूद मिलता है इससे मुग़ल सेनापति वजीर सफदरजंग खफा हो जाता है और अपने सहयोगी भरतपुर के जाट राजा सूरजमल के साथ घासेड़ा पर आक्रमण की तैयारी करता है सूरजमल अपने पुत्र जवाहर सिंह के साथ सेना लेकर यमुना पार कर अलीगढ (कॉल) पर कब्ज़ा करते है इधर बहादुर सिंह कौल दुर्ग की जगह अपने पैतृक किले घासेड़ा पर मोर्चा सँभालने की तैयारी करते है
(तारीखे अहमदशाही, पृ० 47अ; सुजान चरित्र, पृ० 110-111 में इस को पढ़ सकते है)
सूरजमल ने घसेरा के उत्तर दिशा के मोर्चे का नेतृत्व पुत्र जवाहरसिंह और वजीर सफदरजंग को सौंपा। दक्षिण दिशा में बख्शी मोहनराम, सुल्तानसिंह एवं वीरनारायण सहित उसके भाई नियुक्त किए। बालू जाट को आवश्यकतानुसार किसी भी मोर्चे पर मदद पहुंचाने के लिए तैयार रखा गया। स्वयं सूरजमल 5,000 बन्दूकचियों एवं तोपखाने के साथ पूर्वी द्वार जो की मुख्य द्वार होता है वहा से युद्ध के लिए तैयार होता है इस सेना में 30% के करीब मुग़ल सैनिक भी होते है
चारो तरह घिरने के कारण पहले दिन ही बहादुर सिंह को भरी क्षति झेलनी पड़ती है जिसमे उनके भाई जालिमसिंह तथा पुत्र अजीतसिंह घायल हो जाते है लेकिन मुग़ल-जाट सयुक्त सेना को को भी जान माल की हानि होती है
कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहता है इसी बीच जाट सूरजमल किले में मौजूद भारी गोला की चाहत में संधि प्रस्ताव भेजता है जिसमे दस लाख रुपये और सारा तोपखाना और गोला बारूद सौंप देने की शर्त की और मोर्चा उठाना की बात होती है किन्तु हठीले बहादुर सिंह को ने तोपें और बारूद छोड़ देने की शर्त नहीं मानी।
इस बीच घायल हुए बहादुर सिंह के भाई जालिमसिंह की मृत्यु हो जाती है सूरजमल ने भी क्रोधित होकर अपनी सेना को सभी मोर्चों पर शत्रु पर भीषण आक्रमण करने का आदेश दे दिया। 22 अप्रैल की रात्रि को भीषण युद्ध हुआ। दूसरे दिन मीर मुहम्मद पनाह,अलामगीर और नैनाराम सहित जाटों-मुगलो की सेना दुर्ग में प्रवेश करने वाली होती है
लेकिन सूरजमल की सेना ये भूल जाती है की किले में महिलाये और बच्चे भी है घासेड़ा दुर्ग में क्षत्राणिया जब ये देखती है की जीत की कोई उम्मीद नहीं तभी वो जौहर करने का निर्णय लेती है सूरजमल और मुगलो का तिल्सिम उस वक़्त टूट जाता है जब वो देखते है की किले में लकडिया न होने के कारण सैकड़ो राजपूत महिलाय जौहर की रस्म गोला और बारूद पर करती है और इतिहास में अमर हो जाती है इतिहास में एक संभवत पहला मौका होता है जब जौहर की रस्म किसी हिन्दू राजा के सामने हुयी हो इधर क्षत्रिय वीर बहादुर सिंह राघव अपने पुत्र अजीतसिंह के साथ शका करते है और होने सैनिकों के दल के साथ अन्तिम युद्ध के लिए शत्रु पर टूट पड़ा। पिता व पुत्र अन्तिम क्षण तक लड़ते हुए मारे गये और 23 अप्रैल 1753 ई० को घसेरा के दुर्ग में राण त्याग कर अमर हो जाते है (सुजान चरित्र पृ० 140-41 एवं 151; तारीखे अहमदशाही, पृ० ५२ पर जिक्र है)
राजा बहादुर सिंह राघव के पिता का नाम ठाकुर हठी सिंह बडगुर्जर (राघव) था जो अपने आप में एक बड़े डकैत (बागी) थे जिन्होंने मुगलो के कई थाने लुटे थे पूरा क्षेत्र (इनके मूल गांव ढाना जो आज के गुड़गांव में है वहां से लेकर ,घासेड़ा, और कॉल (अलीगढ) तक का इनके कब्जे में था ,इस कारण गिरफ्तार कर कठोर कारावास दिया गया लेकिन इनके गिरफ्तार होते थे मेवात में मेव मुसलमानो का अत्यंत बढ़ गया जो मुग़ल शक्ति कमजोर होने के कारन पास में बनी नयी जाट रियासत भरतपुर के लिए भी खतरा थी ,जाट राजा चूड़ामन ने ठाकुर हठी (हाथी) सिंह को छुड़ाने की सिफारिस की इसके बदले में ठाकुर हटी सिंह को कुख्यात मेव लुटेरे सांवलिया को मारना ठाकुर हठी सिंह ने इस काम को बिना रुकावट कर डाला इसके बदले ठाकुर हठी सिंह बड़गुर्जर (राघव) को मुग़ल सीमा और जाट रियासत भरतपुर सीमा के मध्य का परगना घासेड़ा/घसेरा मिला जिसके अंतर्गत कुल ११ गांव थे जिसमे नूह,मालाब आदि थे
इस घटना पर जरा सा भी संशय हो तो उसके लिए आप (गुड़गांव का गजेटीयर भी पड़ सकते है) साथ ही विश्सनीय प्रतिष्टित लिंक दिए जा रहे है जहा आप इस घटना की पुष्टि कर सकते है हरियाणा सरकार की ओफ्फिसिसल वेबसाइट तक पर इसकी पुष्टि की जा सकती है
1.) https://books.google.co.in/books?id=gKOqA9lgtbwC&pg=PA253&lpg=PA253&dq=bahadar+singh+surajmal&source=bl&ots=vxSRMsJCn_&sig=IqTzxyvtAe0J4ruosfIYzrYfJZ0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiUgf3ljKLWAhUMRo8KHTxuCG8Q6AEIZzAP#v=onepage&q=bahadar%20singh%20surajmal&f=false
2.) http://www.hindustantimes.com/india-news/ghasera-where-mahatma-gandhi-s-legacy-lives-on-waits-for-india/story-I8Z0XY4IrAW07aIc3pw48I.html
3.) http://revenueharyana.gov.in/html/gazeteers/gurgaon_1910/History.pdf
4.) http://www.censusindia.gov.in/2011census/dchb/DCHB_A/06/0620_PART_A_DCHB_FARIDABAD.pdf
5.) https://www.indiatravelforum.in/threads/a-visit-to-a-historical-place.3560/
6.) http://www.historyfiles.co.uk/KingListsFarEast/IndiaJats.htm
7.) http://mahendragarh.gov.in/history.asp
9.) (तारीखे अहमदशाही, पृ० 47अ; सुजान चरित्र, पृ० 110-111)
पुरे विश्व के इतिहास में अंतिम जौहर अठारवी सदी में भरतपुर के जाट सूरजमल ने मुगल सेनापति के साथ मिलकर कोल के घासेड़ा के राजपूत राजा बहादुर सिंह पर हमला किया था। महाराजा बहादुर सिंह ने जबर्दस्त मुकाबला करते हुए मुगल सेनापति को मार गिराया। पर दुश्मन की संख्या अधिक होने पर किले में मौजूद सभी राजपूतानियो ने जोहर कर अग्नि में जलकर प्राण त्याग दिए उसके बाद राजा और उसके परिवारजनों ने शाका किया।
बात 1753 की है दिल्ली के पास हरयाणा के कॉल परगने पर राजा बहादुर सिंह राघव का कब्ज़ा कर दिया था वही पास के घोसड़ा किले पर राजा बहादुर सिंह जी राघव का राज था पूरी तरह से बेख़ौफ़ होकर बहादुर सिंह राज कर रहे थे और मुगलो से लगातर लोहा ले रहे थे लेकिन पास की मुग़ल सल्लनत को फूटी आँख नहीं सुहाते थे मुग़ल सेनापति वजीर सफदरजंग ने किसी भी तरह बहादुरसिंह को रस्ते से हटाने की सोची
तभी मुग़ल सेनापति का एक पत्र बहादुर सिंह को आता है जिसमे कौल दुर्ग से तोपे हटाने का फरमान होता है लेकिन बहादुर सिंह मुग़ल सत्ता को चुनौती के लिए बने थे प्रतिउत्तर में बहादुर सिंह ने मुगलो के कई क्षेत्र अपने कब्जे में ले लिए, मुगलो के थाने लूटने पर बहादुर सिंह राघव को भारी मात्रा में गोला बारूद मिलता है इससे मुग़ल सेनापति वजीर सफदरजंग खफा हो जाता है और अपने सहयोगी भरतपुर के जाट राजा सूरजमल के साथ घासेड़ा पर आक्रमण की तैयारी करता है सूरजमल अपने पुत्र जवाहर सिंह के साथ सेना लेकर यमुना पार कर अलीगढ (कॉल) पर कब्ज़ा करते है इधर बहादुर सिंह कौल दुर्ग की जगह अपने पैतृक किले घासेड़ा पर मोर्चा सँभालने की तैयारी करते है
(तारीखे अहमदशाही, पृ० 47अ; सुजान चरित्र, पृ० 110-111 में इस को पढ़ सकते है)
सूरजमल ने घसेरा के उत्तर दिशा के मोर्चे का नेतृत्व पुत्र जवाहरसिंह और वजीर सफदरजंग को सौंपा। दक्षिण दिशा में बख्शी मोहनराम, सुल्तानसिंह एवं वीरनारायण सहित उसके भाई नियुक्त किए। बालू जाट को आवश्यकतानुसार किसी भी मोर्चे पर मदद पहुंचाने के लिए तैयार रखा गया। स्वयं सूरजमल 5,000 बन्दूकचियों एवं तोपखाने के साथ पूर्वी द्वार जो की मुख्य द्वार होता है वहा से युद्ध के लिए तैयार होता है इस सेना में 30% के करीब मुग़ल सैनिक भी होते है
चारो तरह घिरने के कारण पहले दिन ही बहादुर सिंह को भरी क्षति झेलनी पड़ती है जिसमे उनके भाई जालिमसिंह तथा पुत्र अजीतसिंह घायल हो जाते है लेकिन मुग़ल-जाट सयुक्त सेना को को भी जान माल की हानि होती है
कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहता है इसी बीच जाट सूरजमल किले में मौजूद भारी गोला की चाहत में संधि प्रस्ताव भेजता है जिसमे दस लाख रुपये और सारा तोपखाना और गोला बारूद सौंप देने की शर्त की और मोर्चा उठाना की बात होती है किन्तु हठीले बहादुर सिंह को ने तोपें और बारूद छोड़ देने की शर्त नहीं मानी।
इस बीच घायल हुए बहादुर सिंह के भाई जालिमसिंह की मृत्यु हो जाती है सूरजमल ने भी क्रोधित होकर अपनी सेना को सभी मोर्चों पर शत्रु पर भीषण आक्रमण करने का आदेश दे दिया। 22 अप्रैल की रात्रि को भीषण युद्ध हुआ। दूसरे दिन मीर मुहम्मद पनाह,अलामगीर और नैनाराम सहित जाटों-मुगलो की सेना दुर्ग में प्रवेश करने वाली होती है
लेकिन सूरजमल की सेना ये भूल जाती है की किले में महिलाये और बच्चे भी है घासेड़ा दुर्ग में क्षत्राणिया जब ये देखती है की जीत की कोई उम्मीद नहीं तभी वो जौहर करने का निर्णय लेती है सूरजमल और मुगलो का तिल्सिम उस वक़्त टूट जाता है जब वो देखते है की किले में लकडिया न होने के कारण सैकड़ो राजपूत महिलाय जौहर की रस्म गोला और बारूद पर करती है और इतिहास में अमर हो जाती है इतिहास में एक संभवत पहला मौका होता है जब जौहर की रस्म किसी हिन्दू राजा के सामने हुयी हो इधर क्षत्रिय वीर बहादुर सिंह राघव अपने पुत्र अजीतसिंह के साथ शका करते है और होने सैनिकों के दल के साथ अन्तिम युद्ध के लिए शत्रु पर टूट पड़ा। पिता व पुत्र अन्तिम क्षण तक लड़ते हुए मारे गये और 23 अप्रैल 1753 ई० को घसेरा के दुर्ग में राण त्याग कर अमर हो जाते है (सुजान चरित्र पृ० 140-41 एवं 151; तारीखे अहमदशाही, पृ० ५२ पर जिक्र है)
राजा बहादुर सिंह राघव के पिता का नाम ठाकुर हठी सिंह बडगुर्जर (राघव) था जो अपने आप में एक बड़े डकैत (बागी) थे जिन्होंने मुगलो के कई थाने लुटे थे पूरा क्षेत्र (इनके मूल गांव ढाना जो आज के गुड़गांव में है वहां से लेकर ,घासेड़ा, और कॉल (अलीगढ) तक का इनके कब्जे में था ,इस कारण गिरफ्तार कर कठोर कारावास दिया गया लेकिन इनके गिरफ्तार होते थे मेवात में मेव मुसलमानो का अत्यंत बढ़ गया जो मुग़ल शक्ति कमजोर होने के कारन पास में बनी नयी जाट रियासत भरतपुर के लिए भी खतरा थी ,जाट राजा चूड़ामन ने ठाकुर हठी (हाथी) सिंह को छुड़ाने की सिफारिस की इसके बदले में ठाकुर हटी सिंह को कुख्यात मेव लुटेरे सांवलिया को मारना ठाकुर हठी सिंह ने इस काम को बिना रुकावट कर डाला इसके बदले ठाकुर हठी सिंह बड़गुर्जर (राघव) को मुग़ल सीमा और जाट रियासत भरतपुर सीमा के मध्य का परगना घासेड़ा/घसेरा मिला जिसके अंतर्गत कुल ११ गांव थे जिसमे नूह,मालाब आदि थे
इस घटना पर जरा सा भी संशय हो तो उसके लिए आप (गुड़गांव का गजेटीयर भी पड़ सकते है) साथ ही विश्सनीय प्रतिष्टित लिंक दिए जा रहे है जहा आप इस घटना की पुष्टि कर सकते है हरियाणा सरकार की ओफ्फिसिसल वेबसाइट तक पर इसकी पुष्टि की जा सकती है
1.) https://books.google.co.in/books?id=gKOqA9lgtbwC&pg=PA253&lpg=PA253&dq=bahadar+singh+surajmal&source=bl&ots=vxSRMsJCn_&sig=IqTzxyvtAe0J4ruosfIYzrYfJZ0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiUgf3ljKLWAhUMRo8KHTxuCG8Q6AEIZzAP#v=onepage&q=bahadar%20singh%20surajmal&f=false
2.) http://www.hindustantimes.com/india-news/ghasera-where-mahatma-gandhi-s-legacy-lives-on-waits-for-india/story-I8Z0XY4IrAW07aIc3pw48I.html
3.) http://revenueharyana.gov.in/html/gazeteers/gurgaon_1910/History.pdf
4.) http://www.censusindia.gov.in/2011census/dchb/DCHB_A/06/0620_PART_A_DCHB_FARIDABAD.pdf
5.) https://www.indiatravelforum.in/threads/a-visit-to-a-historical-place.3560/
6.) http://www.historyfiles.co.uk/KingListsFarEast/IndiaJats.htm
7.) http://mahendragarh.gov.in/history.asp
9.) (तारीखे अहमदशाही, पृ० 47अ; सुजान चरित्र, पृ० 110-111)
10.) (सुजान चरित्र पृ० 140-41 एवं 151; तारीखे अहमदशाही, पृ० ५२)