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Wednesday, 31 May 2017

मेरी वो मासूम सी दोस्ती


आज में अपने जीवन के सबसे पुराने उन पलो को लिखने जा रहा हु जब मेरी उम्र मात्र 6 या 7 साल की थी ।
साफ़ साफ़ कह सकते हे की वो मेरा बचपन था ,19 साल बीत गए लेकिन आज भी कभी कभी उन पलो के धुंधले धुंधले से चित्र आँखों के आगे तैरने लगते हे, ज्यादा तो उस समय का कुछ याद नही लेकिन जो याद हे आज लिख रहा हु ,
मेरे दादा जी बहुत ही सिद्धांत वादी इंसान थे और बहुत कड़क मिजाज भी इसलिए अपना सब कुछ होते हुए भी किन्ही कारणों से पापा को घर छोड़ना पड़ा था , और पानीपत में जाकर नोकरी करने लगे थे , बस मेरी आरंभिक शिक्षा भी वही पर हुई थी , उस समय हमारी आर्थिक स्थित बहुत कमजोर थी , उसके बावजूद भी मेरे माता पिता ने मुझे एक अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया,उस समय मेरी मंथली फीस 50रूपये थी
जबकि उस समय में लोग प्राथमिक विद्यालयो में 2 रूपये महीना तक नही दे पाते थे ।
खेर मुद्दे की बात पर आता हु आज क्यों में ये सब लिख रहा हु ? और किसके लिए लिख रहा हु .....

उस समय एक नाम ऐसा था जिसके सिवा में किसी और नाम को नही जानता था , वो नाम था #विक्रम

विक्रम मेरा बहुत अच्छा दोस्त था ,और मुझे बहुत ज्यादा अमीर भी था । मुझे आज भी याद हे, वो आलू के पराठे और तरह तरह के खाने की चीजे अपने टिफिन में लाया करता था , लेकिन स्कूल आने7 के बाद वो मुझसे मेरा लंच बॉक्स ले लिया करता था और अपना लन्च मुझे दे दिया करता था , रेसिस (इंटरवल) होते ही हम दोनों दौड़कर रेलवे ट्रैक की तरफ जाते थे और पटरी के पास बैठकर खाना खाते ,वो मेरे सादे पराठे खाया करता था , जबकि उसके टिफिन में आलू के पराठो के साथ साथ फ्रूट भी हुआ करते थे मुझे उस समय ऐसा महसूस होता था जैसे वो दुनिया का सबसे रहीस बच्चा हो , उसके टिफिन को में बड़े तबियत के साथ चट कर जाता था विक्रम शायद मुझसे कुछ बड़ा था और शायद मुझसे थोडा समझदार भी,
रेलवे ट्रैक हमारे स्कूल के पास में ही था , जब भी कोई ट्रेन वहा से गुजरती तो हम दोनों झट से उसका नम्बर लिखने लगते थे, आप ये सोच रहे होंगे ऐसा क्यों..? क्योंकि विक्रम को किसी ने बताया था की अगर हम सौ ट्रेन के नम्बर नोट कर ले तो एकट्रेन हमारी हो जायेगी  ,
अब क्या करे हम नादाँन और मासूम थे , रेलवे ट्रैक पर जाना मना था लेकिन हम हर रोज जाया करते थे
वही लन्च करते और वही से पत्थर उठाकर कंटीली झाड़ियो पर मरते
एक बार हम दोनों को मेम ने रेलवे ट्रैक पर देख लिया उसके बाद जब हम क्लास में वापस लौटे तो मेडम ने हम दोनों को गुस्से में अपने पास बुलाया उस समय में पूरी तरह डर गया था
सबसे पहले मेडम ने मेरा कान पकड़ा और जैसे ही कान पर अपने दूसरे हाथ से तमाचा रसीद करने वाली थी तुरंत विक्रम ने कहा नही मेम इसको में लेकर गया था मनु की कोई गलती नही हे  , उसके बाद मेम ने मुझे तो छोड़ दिया लेकिन विक्रम को 5 छड़ी खानी पड़ी ।
में बहुत खुश था कि मेरी जान बच गयी , जबकि विक्रम बेचारा थोडा मायूस हो गया था उसके हाथ लाल हो गए थे छड़ी के निशान साफ दिख रहे थे ।

लेकिन उसके बाद भी हम दोनों ने रेलवे ट्रैक पर जाना न छोड़ा , में उसे मना करता था की में नही जाऊंगा मेम बहुत मारेगी वो मुझे यही बोलता तुझे नही पीटने दूंगा चल ना यार
में फिर भी नही जाता था लेकिन एक दिन किसी ने मुझे बताया की रेल की पटरी पर अगर 50 पैसे रख दे और ऊपर से ट्रेन गुजर जाये तो 50 पैसे चांदी के बन जाते हे ।
बस ये एक्सपेरिमेंट करने के लिए में उसके साथ एक बार और गया....।
विक्रम ने अपनी जेब से अठननी निकाली और पटरी पर रख दी ,
ट्रेन आने वाली थी हम झाड़ियो में छुपकर बैठ गए , जैसे ही ट्रेन अठन्नी के ऊपर से गुजरी हमारी उत्सुकता बढ़ने लगी ट्रेन गुजर जाने के बाद हम तेजी से पटरी की और दौड़े...और ये क्या सिक्का तो पूरी तरह पटरी से चिपका हुआ था और उसका आकार भी पहले से दो गुना था, जैसे ही उसे मेने छुआ तो मेरा हाथ जल गया ,
बड़ा दुःख हुआ एक्सपेरिमेंट फेल हो गया और सिक्के का भी नुकसान हो गया ,
खेर फिर हम हर रोज रेलवे ट्रैक पर जाने लगे ।
हम दोनों छुट्टी होने के बाद बर्फ का गोला खाया करते थे । पैसे हर बार विक्रम ही देता था , हम साथ खेलते थे सबसे अलग रहा करते थे , कभी लट्टू खुमाते कभी रेलवे ट्रैक पर जाकर पत्थर उठाकर इधर उधर फेंकते , कभी झाड़ियो में छुपते , समय के साथ साथ हम काफी अच्छे दोस्त बन गए थे , उसके पापा उसे स्कूटर पर स्कूल छोड़ने आते थे जबकि में पूरे 2 किलोमीटर पैदल जाया करता था ,
कभी कभी पापा मुझे साइकिल से छोड़ आते थे , वरना हर रोज पैदल ही जाया करता था , मेरी पीठ पर एक बहुत बड़ा बेग लदा रहता था , आज भी याद हे रस्ते में एक पुल पड़ता था उसकी चढ़ाई चढ़ने में मेरी हालत पतली हो जाती थी , गर्मियों में तो मै पसीने में लथ पथ हो जाया करता था लेकिन मेरी मेडम मुझे बहुत प्यार करती थी स्कूल में पहुचने पर वो सबसे पहले मुझे बुलाती और अपने दुपट्टे से मेरा मुह पोंछती थी ।
हर रोज की तरह में स्कूल जा रहा था जैसे ही में पुल पर चढ़ा तो मेने देखा विक्रम पुल पर खड़ा हे , में उसे देखकर बड़ा ही हैरान हुआ , उसने कहा अबसे में भी पैदल ही स्कूल जाया करूँगा तेरे साथ ,
बस फिर क्या फिर हम हर रोज स्कूल साथ जाया करते और साथ आया करते , वो हर रोज पुल पर खड़ा होकर मेरा वेट किया करता था , असल में पुल के रस्ते से हम दोनों के सस्ते अलग हो जाया करते थे ।
हम दोनों मासूम से बच्चे एक दूसरे के बेग पर मुह रखकर आया करते थे ,
और ये बोलते हुए बिल्ली बिल्ली तेरा घर कहा हे ......नीम के तले../

समय बीतता गया दादा जी का देहांत हो गया था ,सो हमे अपने घर वापस लौटना था , मम्मी ने मुझे बताया कि हम अपने गांव जायँगे कल , अब हम यहाँ नही रहेंगे , ये सुनकर में बहुत खुश हुआ की मेरा भी कोई गांव हे , मेने ममी से पूछा वहा हमारा घर हे ?, तब मम्मी ने कहा बहुत बड़ा इससे भी बहुत बड़ा जहा हम रहते हे , अब तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न था , में बस ये सोच रहा था की कैसे ही सुबह हो और में विक्रम को जाकर ये सब बता दू की मेरा भी बहुत बड़ा घर हे,

क्योंकि मुझे अबसे पहले नही पता था की हमारा भी बहुत बड़ा घर हे क्योंकि पापा ने शादी के तुरंत बाद घर और गाँव छोड़ दिया था ।

अब तो बस सारी रात में यही सोचता रहा की सुबह स्कूल में सबको बताऊंगा की में बहुत अमीर हु ,
बस फिर क्या सुबह हुई और में तेजी के साथ स्कूल के लिए तैयार हुआ ,
ममी ने मुझे मना कर दिया कि अब तुम स्कूल नही जाओगे आज हम अपने गांव जायेंगे , मेने ममी से कहा plz आज जाने दो भले ही पापा को भेज देना वो मुझे इंटरवल से ले आएंगे , खेर मम्मी ने मेरी बात मान ली और मुझे स्कूल जाने दिया ।
मेने स्कूल में जाते ही सबसे पहले ये खबर विक्रम को सुनाई , , वो मेरी बात सुनकर चुप चाप बड़े गोर से मुझे देखने लगा , में बहुत खुश था मेने उसे बताया की अब हम यहा नही रहेंगे अपने घर जायेंगे कल
1 घंटे तक में बक बक करता रहा मुझे लग रहा था की शायद उसे भी उतनी ख़ुशी मिल रही होगी जितनी मुझे ,
लेकिन में गलत था आज मुझे पता चला उसे कितना दुःख हुआ होगा
पापा अपनी साइकिल लेकर स्कूल में मुझे लेने आ गए थे..

मेने झट से बेग उठाया और मेडम को बाय बोलते हुए पापा की और दौड़ा ,

तभी पीछे से आवाज आई .......मनु

वो मुझे मनु बुलाया करता था ,
साईकिल पर बैठने से पहले में रुका ।
मेने पीछे मुड़कर देखा .........विक्रम की आँखों में आँशु थे , विक्रम रो रहा था....उसके आंशुओं का मुझपर लेश मात्र भी फर्क न पड़ा मेरे अंदर ख़ुशी का सागर उमड़ रहा था , इसलिए शायद उस समय उसकी भावनाओ को मै समझ न सका , वो अपने हाथ में HB की पेन्सिल लिए हुए था , उसने वो पेन्सिल आधी तोड़कर मुझे दे दी , मेने वो आधी टूटी पेन्सिल अपने नेहकर की जेब में रखली और में साईकिल पर जाकर बैठ गया , विक्रम बहुत जोर-जोर से रोने लगा , में दूर से देख रहा था मेडम ने उसे अपनी गोदी में लेते हुए उसे अपने गले से लगा लिया लेकिन उसका चिल्लाना नही रुका मनु......मनु....मनु

तब में बहुत छोटा था दोस्त ,
दोस्ती जैसी नाम की कोई चीज भी होती हे मुझे नही पता थी ,

लेकिन आज तुझे बहुत मिस करता हु दोस्त , तेरा चेहरा तो याद नही बस नाम याद और तेरा अहसान याद हे
और वो सब चीज याद हे जो हमने साथ में की आज भी किसी पुल से गुजरता हु तो लगता हे जैसे विक्रम खड़ा हो और वो मुझे मिल जाये ,
में तो बड़ा लापरवाह निकला दोस्त तेरी दी हुई उस अमूल्य धरोहर को भी संजोकर न रख पाया आज से 10 साल पहले मेने उस टूटी हुई पेन्सिल को खो दिया घर का चप्पा चप्पा कोना कोना खोजा लेकिन वो टूटी पेन्सिल न मिली  जिस दिन मेने उसे खोया उस दिन में बहुत रोया था।
क्योंकि मेने अपने जीवन के सबसे बड़े उपहार को जो खोया था ,

आज पता चला की वो मेरे लिए क्यों पीटा तब में खुश था लेकिन आज दुःख होता हे की एक भी बार में उसे  थैंक्यू नही बोल पाया ,
आज इसलिए लिख रहा हु क्योंकि शोशल मिडिया का जमाना हे उस समय मोबाईल जैसी कोई चीज न थी लेकिन आज हे और आज फेसबुक जैसा शोशल मिडिया का सशक्त माध्यम भी हे , हो सकता उसका भी फेसबुक अकाउंट हो , और मेरी ये पोस्ट उसके अक्काउंट से टकरा जाए अगर मेरी ये पोस्ट तुम तक पहुच गयी दोस्त......तो समझ लेना तुम्हारा ये दोस्त मनु तुम्हे आज बहुत मिस करता हे ।

........................तुम्हारा दोस्त मनु

आख़िर ज़ीवन है क्या ?

 एक लंबे समय बाद आज कुछ लिखने का मन है मुझे नहीं पता था की आज भी कुछ लोग मेरी विचारधारा को उतना ही पसंद करते है जितना पहले पसंद किया करते थे...