Friday, 23 June 2017

प्यास क्या होती है ये मुझे तब पता चला


प्यास क्या होती उस रात पता चला.... , पढिये ये आपबीती कहानी

जोनल गेम्स में एकबार मुझे कॉलेज की तरफ से खुर्जा जाना पड़ा , चुकी मैं कॉलेज की तरफ से  वॉलीवाल का एक सीनियर ओर पास आउट स्टूडेंट था , मेरे जूनियरो के विशेष आग्रह पर में भी उनके साथ जोनल गेम्स में पहुच गया,
दुष्यन्त राघव नाम का मेरा एक  जूनियर था जो वही खुर्जा से बिलोंग करता था , वैसे तो हम सभी खिलाड़ियों के लिए कॉलेज होस्टल में ठहरने की विशेष सुविधा उपलब्ध थी , फिर भी दुष्यन्त के विशेष आग्रह पर मेने ओर मेरे एक दोस्त अमित शर्मा ने  उसके घर पर ही ठहरना उचित समझा ,
हमारे साथ एक स्टूडेंट ओर था जिसका नाम अभिनव चौहान था जो दुष्यन्त का मित्र ओर मेरे लिए छोटे भाई की तरह था ।
अब हम तीनों दुष्यन्त के साथ उसके घर की ओर चल पड़े ,
उस रात को दुष्यन्त के घर पर हमारी जमके खातिरदारी हुई ,

(उस रात ओर उन यादगार पलो के लिए दुष्यन्त को में आज यहां से धन्यवाद देना चाहूंगा )

खाना खा पीने के बाद हमारी सोने की व्यवस्था ऊपर वाले कमरे में कि गयी ।
दुष्यन्त हम तीनों का बिस्तर ऊपर वाले कमरे में लगा कर चला गया,
उस रात दुष्यन्त की सबसे बड़ी गलती ये रही कि वो सीढियो वाले दरवाजे को बाहर से बंद करके चला गया ,
मतलब अब हम तीनो ऊपर वाली छत पर पूरी तरह लॉक हो चुके थे ,ओर इस बात की हमे कोई खबर भी न थी ,
अगले दिन अभिनव का सांस्कृतिक प्रोग्राम था उसने नृत्य प्रतियोगिता में भाग लिया हुआ था , तब मैंने अभिनव को कहा कि चल डांस का रिहर्सल कर ले कल सुबह तेरी इवेंट भी है , तब अमित ने भी मेरी हा में हां मिलाते हुए उसे कहा कि हां चलो तुम्हारा रिहर्सल हो जाएगा और हमारा मनोरंजन भी ।
तब अभिनव ने उस रात हमे डांस करके दिखाया ओर वाकई उसका डांस काबिले तारीफ भी था क्योंकि उसने राजपकपूर के गाने "मेरा जूता है जापानी" पर जबरदस्त एक्टिंग के साथ सेम टू सेम रोल प्ले किया था ।उसने ओर भी गानों पर एक से एक डांस किया ।
बस हम रात भर युही मस्ती करते करते सो गए ,

अब रात के 2 बजे थे मेरी सोते सोते आंख खुली, मेरा गला सूख रहा था मुझे बड़े जोरो की प्यास लगी हुई थी , मेने पूरे कमरे में नजर दौड़ाई कही भी पानी रखा हुआ दिखाई नही दे रहा था , दरअसल खाना खाने के बाद में कभी भी पानी नही पीता ओर इसलिए उस दिन भी खाना खाने के बाद मेने पानी नही पिया था , इसलिए जोरदार प्यास लगनी तो निश्चित सी बात थी,
थोड़ी देर तक खाट पर लेटा हुआ मैं पानी के बारे में सोच ही रहा था कि अभिनव की भी प्यास के कारण आंख खुल गयी,
ओर उसने भी उठते ही पानी पीने की इच्छा जताई ओर बोला मोहित भाई बहुत तेज़ प्यास लगी हुई है और साथ ही साथ बोल उठा आप क्यों जगे हुए हो .?

मेने भी कहा जिस वजह से तू अब जगा है मेरी वजह भी वही है ।

अब मेने उसे कहा चल नीचे जा ओर पानी ले आ बुरी तरह से प्यास लगी है और गला भी सूख रहा है , खेर उसने तुरंत मेरी आज्ञा का पालन किया और शर्दी की उस रात में गर्म रजाई का मोह त्यागकर बिस्तर से उठा , जैसे ही वो रूम से बाहर निकल कर सीढियो (जिसे गांव में जिन्ना भी बोलते है ) पर लगे दरवाजे पे पहुचा तो पाया दरवाजा बाहर से लॉक है , वापस रूम में लौटकर उसने मुझे बताया कि भाई नीचे जाना नामुमकिन है क्योंकि सीढियो का दरवाजा बाहर से बंद है । हम दोनों की चहलकदमी की आवाज से अब अमित शर्मा भी उठ गया ओर उसने भी उठते ही एक ही चीज मांगी "पानी" 

यानी हम तीनो अब जोम्बी की तरह हो गए थे,
एक के बाद एक मे वही असर दिख रहा था , प्यास ................
जब अमित को पानी की सारी कहानी बताई तो उसने अभिनव को कहा अरे दुष्यन्त का फोन लगा .....
वो पानी लेकर आएगा ।
दिल अचानक से खुश हुआ चलो ये रस्ता तो है हमारे पास क्यों न दुष्यन्त को फोन लगाया जाए ,
प्यास जोरो पर थी , गला सूख रहा था ,पानी का नाम लेते ही प्यास अपनी चरमसीमा पर पहुँच जाती थी ,

तभी नम्बर डायल करते ही आवाज आई कि -"आप जिस नम्बर पर सम्पर्क करना चाहते है वो अभी बन्द है "

धत तेरी की गयी भैंस पानी मे आखिरी उम्मीद भी अब टूट चुकी थी हम तीनो का प्यास के कारण बुरा हाल था ,सुबह होने में अभी 4 घंटे बाकी थे , शर्दी की उस रात में प्यास की वजह से हमे पसीना आ रहा था , बुरी तरह फसे अब क्या करे ?आखिर अनजान जगह पर इतनी रात गए हल्ला गुल्ला करके किसी को जगाना भी तो उचित न था ।

में ओर अमित अपनी अपनी खाट पर बैठे थे , ओर अभिनव पानी की जुगत में इधर उधर घूम रहा था कमरे में सिर्फ वो गिलास था जिसमे हमने रात को दूध पिया था ,हम लगभग उस गिलास में एकसौ बार झांक कर देख चुके थे शायद पानी कही से इसमे आ गया हो ,
बस उसी गिलास को हाथ मे लिए अभिनव इधर से उधर घूम रहा था , शायद उसको हम दोनों का प्यास के कारण छटपटाना देखा न जा रहा था ।तभी अभिनव रूम से बाहर गया और थोड़ी देर बाद अंदर आया उसके हाथों में वही गिलास था , उसने मुझसे कहा गुरुजी ये लो पानी पियो ...में बड़ा हैरान था ....पानी ..?? अरे कहा से लाया .?

उसने कहा पहले पियो मेने कहा हम तीन है और ये एक गिलास पानी ..????

उसने कहा चिंता मत करो मेने पी लिया है अब तुम भी पियो ...।
मेने खटाक से पूरा गिलास गटक लिया।
लम्बी सांस लेते हुए मेने उससे कहा एक ओर मिलेगा उसने कहा बिल्कुल अभी लाया ।
थोड़ी देर बाद वो फिर एक गिलास पानी ओर ले आया ऐसे करके मेने तीन गिलास पानी पिया , उसके बाद अमित ने भी यही सवाल किया के पानी ला कहा से रहा है तू..?
वो बस यही कहता कि गुरुजी पहले आप पानी पियो ......।
हम दोनों पानी पी चुकने के बाद एक लंबी सांस ले रहे थे उस समय हमे जो आनंदमय अहसास हो रहा था उसे शब्दो मे बया करना मुश्किल है, ऐसा लग रहा था मानो मृत शरीर में नई चेतना आ गयी हो ,
अब  हम दोनो ने अभिनव से पूछा बता अभिनव पानी कहा से लाया तू..?
उसने कहा रहने दो गुरु जी आपकी प्यास बुझ गयी और क्या चाहिए आपको ,
हमने कहा नही ये रहस्य तो तुझे बताना पड़ेगा यहां दूर दूर तक कोई पानी का साधन नही फिर भी तू पानी ले आया...कैसे..????

तब जोर देने पर उसने कहा कि गुरुजी गुस्सा मत होना
" में छत की आखिर में बनी लेटरिंग (टॉयलेट) की टोंटी से पानी लाया हूं.............樂

------------कुँवर मोहित राणा

Diggvijay Singh Rajput
Dushyant Raghuvanshi
Amit Kumar

Wednesday, 21 June 2017

"सर तुस्सी ग्रेट हो "दिवाकर शुक्ला की कलम से


My self - Diwakar Shukla s/o Ramakant shukla
Vill- pariyawa
Post- derauva
Dist- Pratapgarh
Pin - 230128

प्रिय मोहित राणा सर जी -

सर जी नमस्ते आप मुझे बहुत ही अच्छे लगते है ।मेने अपने जीवन मे बहुत से आदमियों से मिला लेकिन मुझे आप जैसा समझदार व्यक्ति नही मिला ।
आप बहुत ही समझदार ओर नेक फरिस्ते हो ।अपने अपनी जिंदगी मे बहुत कुछ खोया है ,कही खेल के लिए तो कही दोस्तो के लिए कही किसी ओर के लिए ,लेकिन सर जी खोना उतना ही चाहिए "एक सीमा तक"।सर जी आप अपनी लाइफ को sequre बनाइये ,में आप से आशा करता हु की आप एकदिन जरूर कामयाब होंगे । मेरा दिल कहता है । कि वो दिन दूर नही जब आप एक कामयाब व्यक्ति के रूप में नजर आएंगे ।
Best of luck

" जिंदगी है तो झमेले भी है
खुशी गम के मेले भी है
सफलता उन्ही के कदम चूमती है
जो मुश्किलों में चले अकेले है "

सर जी आपसे वो मिला जो आजतक किसी से भी नही मिला
वे प्रेरणा पूर्ण बाते जिन्हें सुनने के बाद शरीर मे एक नया उत्साह
कुछ ऐसा करने के बारे में जिससे कि मेरा नाम हो ,ओर शरीर मे एक नई energy सी आ जाती है
जब आप हमसे बाते करते है ।
सर जी आपके बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम है ।

सर जी
.........तुसी ग्रेट हो /

(मेरी डायरी का एक अंश)


Tuesday, 13 June 2017

एग्जाम रूम में जब मुझे बाहर निकाल दिया गया

बी.ए के पेपर में जब मुझे अपमानित करके एग्जामिनर ने क्लास से बाहर कर दिया था । लेकिन उसके बाद भी में उदास होने की बजाए बहुत खुश था । पढिये मेरी ये सच्ची घटना--

बात उन दिनों की है जब में बी.ए
प्रथम वर्ष का छात्र था , असल मे मैं बचपन से ही बहुत ही सिद्धान्त वादी इंसान रहा हु । ओर इसीलिए भारतीय संस्कृति और इससे जुड़ी हर चीज का में सम्मान करता हु
में बीए में इंग्लिश लेने वाला था ,
लेकिन फिर मेरे एक दोस्त ने मुझपर एक ऐसा तंज कस दिया कि मुझे अपने निर्णय को बदलना पड़ा, उसने कहा तू तो बड़ा हिंदी हिंदी करता था अब अंग्रेज बनेगा ?
उसकी ये बात मुझे अखर गयी ओर मेने सोचा आखिर में हिंदुस्तानी हु ओर अपनी मातृभाषा का बहुत सम्मान भी करता हु । फिर आज इंग्लिश को हिंदी की अपेक्षा क्यों ज्यादा वरीयता दे रहा हु । आखिर मुझ जैसा राष्ट्रभक्त ही हिंदी को प्राथमिकता नही देगा तो फिर कोन देगा .? बस यही सोचते सोचते मेरा हिंदी प्रेम उमड़ कर परवान चढ़ गया और मेने अंग्रेजी छोड़ संस्कृत ले ली ।
अब हमे क्या पता था हमने अपना सर गिलोटिन मशीन में डाल दिया था ,निकाले तब भी मरे ओर डाले रखे तब भी मरे,
क्योंकि संस्कृत का तो "स:" भी मुझे न आता था ।
इसीलिए में संस्कृत के लेक्चर में ज्यादार चुपचाप ही रहता था ।
कई बार प्रोफेसर कोई प्रश्न पूछती तो में जानते हुए भी वो बता न पाता था , अब पूछो क्यों क्योंकि मेरी संस्कृत की क्लास में , मै अकेला ही लड़का था , वैसे तो ओर भी दो थे लेकिन वो मुश्किल से ही कॉलेज आया करते थे ।
अब 30 लड़कियों में, मैं अकेला लड़का था....इसलिए मेरे अंदर झिझक का होना तो स्वभाविक था ही ।
इस कारण से क्लास में ज्यादातर लडकिया कभी कभी मेरी चुटकी भी ले लिया करती थी।
अब में संस्कृत पड़ता तो रोज था लेकिन किसी को महसूस नही होने देता था , सच बताऊ तो वार्षिक परीक्षा आते आते ,में उन सबसे बहुत ज्यादा
Knowledgeble हो गया था ।

खेर परीक्षा आ गयी और में अपनी पूरी तैयारी के साथ एग्जाम रूम में जाकर बैठ गया ,
अब जब तक एग्जाम पेपर हाथ मे न आ जाये तब तक शरीर मे एक बैचेनी सी रहती है ,
खेर मेरे हाथ मे एग्जाम पेपर आ ही गया पेपर देखते ही मेरा चेहरा खिल उठा क्योंकि जिन प्रश्नों की मेने तैयारी की थी वही प्रश्न एग्जाम में आये हुए थे ,
मेने वो झट से सारा पेपर डेढ़ घंटे में कर दिया और आराम से चुप चाप बैठ गया ,वैसे भी जिस छात्र के पास इंटर में पीसीएम जैसे भारी भरकम सब्जेक्ट हो उसके लिए ऐसा पेपर बहुत ही सरल था ,
में पेपर करने के बाद अपने आस पास के सभी स्टूडेंट पर नजर घुमाकर देख रहा था ,तभी मेरे बाये तरफ एक लड़की जो पूरी क्लास में खुद को सबसे ज्यादा इंटेलिजेंट मानती थी ओर कुछ हद तक वो होशियार थी भी।किन्ही कारणों से उस लड़की का नाम मैं यंहा सार्वजनिक नही कर सकता ।
उस लड़की ने मुझसे इसारे में दबी सी आवाज से पूछा तुमने सारा पेपर सॉल्व कर दिया , मेने भी गर्दन हिलाकर हा कर दी । तब उसने कहा plz कुछ क्युस्चन मुझे भी बता दो , तब फुस फूसि सी आवाज में मैने गर्दन नीची करते हुए उसे कई सवालों के उत्तर बता डाले अब आखिर टीचर तो टीचर होता है ,
तभी जो हमारे रूम की एग्जामिनर थी उसने मुझे आकर पकड़ लिया । और मेरी उत्तर पुस्तिका ले ली, मेरे कुछेक सवाल बाकी थे जिनका मुझे नही पता था , में सोच रहा था इन्हें बाद में तुक्के मार कर कुछ वैसे ही कर दूंगा जैसे तीन चार पार्टी मिलकर सरकार बनाती है या फिर क्रिकेट मैच के अंतिम ओवरों में जैसे जाहिर खान बेटिंग करते वक़्त आड़े तिरछे शॉट मार करके रन कूट भी लेता है और नही भी ।
बस में भी कुछ वैसी ही जुगत लगा कर उन सवालों को दागने वाला था, लेकिन तभी टीचर ने आकर मेरी उत्तर पुस्तिका ले ली और एग्जाम रूम से बाहर जाने को कहा, मेने मेडम से  rqst भी की । लेकिन कोई बात न बनी
तभी टीचर ने कहा अच्छा ये "बताओ तुम इस लड़की से उत्तर पूछ रहे थे या फिर इसको बता रहे थे ".? उसके बाद ही में तुम्हे तुम्हारी उत्तर पुस्तिका वापस दूंगी ।
अब मेने उस लड़की की तरफ देखा जो शर्म के मारे अपनी आंखों को झुकाये खुद में ही सिमट रही थी ।
बस पता नही मुझे क्या हुआ उस दिन मेने टीचर से पहली बार झूट बोला । मेने टीचर से कहा - कि मेम में ही उस लड़की से सवाल पूछ रहा था । उसके बाद तो मेम ने सीधा सीधा मुझे बाहर जाने को कहा , बोली कि तुम फिर इसे परेशान करोगे अब तुम्हे पेपर शीट नही मिलेगी । "गेट आउट "

सभी स्टूडेंट के सामने ये मेरा बहुत बड़ा अपमान था ।
खेर फिर भी मेरे चेहरे पर लेश मात्र भी निराश न थी ।
क्यों .? क्योंकि किसी के लिए किए गए त्याग और समर्पण का अपना एक अलग ही आनंद है ।
मन में एक गहरी शांति थी । और चित्त भी प्रश्न था ,
एग्जाम खत्म हुआ सब स्टूडेंट बाहर आ गए। में वही पास की दुकान पर खड़ा कोल्ड ड्रिंक पी रहा था , जैसे ही बस आई तो सब  स्टूडेंट बस में चढ़ गए लेकिन वो लड़की नही चढ़ी , जब अगली बस आई तो में उसमे चढ़कर बैठ गया झट से वो लड़की भी मेरे पास वाली सीट पर आकर बैठ गयी , तभी में अचानक से ठिठक गया क्योंकी गांव देहात में ऐसी स्थिति में बैठे लड़के और लड़की को लोग संवेदन सील दृष्टि से देखते है । में अपने को इस स्थिति में असहज महसूस कर ही रहा था कि तभी उस लड़की ने कहा ..थैंक्यू मोहित ।
ओर फिर प्रश्न किया कि तुमने एग्जामिनर से झूठ क्यों बोला?
बस मेने उसे इतना ही कहा - कि वैसे भी क्लास में ओर टीचर की दृष्टि में मेरा कोई विशेष सम्मान नही है में अपमानित हुआ कोई बात नही वैसे भी हम लड़को की इज्जत बेइजती कोई मायने नही रखती। लेकिन तुम पूरी क्लास में सबसे ज्यादा होशियार हो और तुम्हारी बहुत रेस्पेक्ट भी है । बस इसीकारण से मैने झूट बोल दिया ,
ताकि तुम्हारा सम्मान बना रहे ।
मेरा उत्तर सुनकर उस लड़की ने अपनी भीगी आंखों से कहा कि मुझे नही पता था ऐसे भी लड़के होते है जो लड़कियों की इतनी रेस्पेक्ट करते है ।
तुम्हें दिल से थैंक्यू मोहित ।

मेरा बस स्टैंड आ चुका था , में गाड़ी से उतरकर अपने रास्ते की ओर चल पड़ा , लेकिन गाडी के आंखों से ओझल होने तक वो लड़की मुझे देखती रही शायद उसकी बात अभी खत्म नही हुई थी...

-----------------कुंवर मोहित राणा


Wednesday, 31 May 2017

एक चोर खुद चोरी करने के बाद लेने लगा लोगो की तलासी


कल में इंदौर उज्जैनी एक्सप्रेस ट्रेन में गाजियाबाद से मुज़फ्फरनगर जा रहा था ,
तभी एक ऐसा वाक्या मेरे सामने घटा जिसे देखकर में दंग रह गया , हुआ कुछ यु की मै ट्रेन की साधारण बोगी में सफ़र कर रहा था ,और औसतन सभी एक्सप्रेस ट्रेन की साधारण बोगियों में भीड़ अधिक रहती हे ।
बस मेरे उस डब्बे में भी भीड़ बहुत थी , सीट पर बैठने की तो बहुत दूर की बात खड़े होने में भी बहुत मुश्किल से जगह मिल पा रही थी , मै एक हाथ से ऊपर की सिट को पकड़े गर्दन झुकाये खड़ा था ,तभी मेरी नजर एक आदमी पर पड़ी,
चूँकि उसके अंदर एक बेचैनी सी थी उसकी विचित्र सी हरकते में तिरछी नजर गाढ़े हुए देखने लगा, उसके पहनावे को देखकर लग रहा था की वो ठीक ठाक परिवार से हे, दिखने में वो जेंटल इंसान एक रिबन का चश्मा अपनी वी सेफ बनियान पर आगे की और लटकाये हुए था , उस ट्रेन में सभी यात्री लगभग अपनी कशमकश में व्यस्त थे , तभी उस जेंटल इंसान ने एक ऐसे कार्य को अंजाम दिया जिसे देखकर में दंग रह गया ,
उस इंसान ने अपने पास में खड़े एक यात्री का फोन धीरे से चुरा लिया, और झट से स्विच ऑफ़ करते हुए उसे अपनी जीन्स की पेंट के अंदर ठूंस लिया , शायद अपने अंडर वियर में ।
में पहले नींद भरी आँखों से उसे देख रहा था , लेकिन जैसे ही उसने इस घटना को अंजाम दिया मेरी चेतना अचानक से सजग हो गयी , में बड़े ही विस्मयी मुद्रा से उसे देखने लगा उसकी इस हरकत को देखकर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था , खेर में कर भी क्या सकता था , क्योंकि जिस महापुरुष के साथ ये घटना घटी उन्हें अब तक इस बात का अनुमान तक न था , फिर मैने सोचा में ही उड़ता तीर क्यों लू ? जब उसे पता चलेगा तब की तब देखी जायेगी बस यही सोचकर में उसे सिर्फ देखता रहा ,
अभी 5 ही मिनिट हुई थी की जिसका फोन चोरी हुआ था उसने अपनी बाई जेब पर हाथ  रखा तो वो अचानक से चोंक पड़ा उसने तेजी के साथ अपनी दोनों जेब चेक की तो पाया फोन गायब हे, उसने जोर से हल्ला किया "भाईसाब मेरा फोन चोरी हो गया , इधर उधर देखता हुआ भौचक्का सा हो गया। डब्बे की सभी सवारी अगल बगल देखने लगी , तभी वो जेंटल इंसान जिसने फोन चुराया था , उस व्यक्ति के पास आया और बोला आप चिंता मत करो आपका फोन इसी डब्बे में हे , आप बस ये बताओ की लास्ट टाइम आपने फोन को कब अपनी जेब में रखा था , ट्रेन में चढ़ने से पहले या ट्रेन में चढ़ने के बाद ?
तब उसने कहा की भाई ट्रेन चलने के बाद तक फोन मेरे पास था लगभग 20 मिनिट भी नहीं हुई होंगी जब मेने फोन को अपनी जेब में रखा था ,
तब वो चोर बोला की बस तो चोर इसी ट्रेन में हे क्योंकि ये ट्रेन अब मेरठ ही रुकेगी , गाजियाबाद के बाद इसका पहला स्टेशन वही हे ।
चोर ने उसे कहा चलो हम दोनों मिलकर सबकी तलासी लेते हे ,
क्योंकि अभी तक ट्रेन का कोई भी स्टोपिज नहीं आया , चोर इसी में हे ,खेर आपका फोन कोनसा था .? चोर ने उससे पूछा तब उसने कहा भाई बीस हजार रूपये का सेमसंग का फोन था
चोर ने कहा ठीक हे चलो तलाशी लेते हे सबकी , जिसका फोन चोरी हुआ था उसने भी हां करते हुए तलासी लेनी शुरू कर दी ,
दोनों सवारियो की तलासी लेने लगे , एक एक  करते हुए तलाशी देने का नम्बर मेरा आ गया, (जो इस घटना को आरम्भ से देख रहा था )उस चोर ने मुझसे कहा भाईसाहब अपनी तलाशी दीजिये ,इसलिए थोडा सीधे खड़े हो जाये और अपना कमर से बेग भी उतारिये , मेने सीधे सीधे उसे मना कर दिया में तलाशी नहीं दूंगा , सब सावरिया अचानक से मुझे इस तरह घूरने लगी जैसे में ही चोर हु , जिसका फोन चोरी हुआ था वो भी अचानक से मेरी तरफ लपका ।
अब उस चोर ने बड़ा एटिट्यूड दिखाते हुए मुझे कहा तू अपनी तलाशी क्यों नहीं देगा बे .?

इतना सुनते ही मेने अपने दांये हाथ से एक तमाचा उस चोर की कनपटी पर रसीद कर दिया ,
उसने मुझपर हमला किया मेने दूसरे बांये हाथ से फिर एक और तमाचा उसकी कंसरि पर सूत दिया ,
जिसका फोन चोरी हुआ था वो भी बड़े गुस्से के साथ मुझ पर टूट पड़ा तब मेने कहा सुन भाई तेरा फोन अभी देता हु , मुझे गलत मत समझ ।
वो एकाएक रुक गया , अब मेने उस चोर का गिरेबान पकड़ा और कहा चल इसका फोन दे , ये सुनते ही सभी यात्री चोंक पड़े , और वो चोर बोला भाईसाहब मेरे पास फोन नहीं हे।
खेर दो तमाचों का असर इतना तो हुआ की वो बे से भाईसाहब पर आ गया , मेने उसे फिर कहा यही देगा या पोलिस स्टेशन में जाकर ? तब उसने अपनी गर्दन को झुकाते हुए अपनी पेंट के अंदर से फोन निकाला और बोला plz भाईसाब मुझे पोलिस में मत देना ये मेरी बहुत बड़ी  गलती थी मुझे खुद महसूस हो रही हे माफ़ कर दो plz वो बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा ,
ये सब देखकर लगभग सभी सवारी उस चोर के खेल को समझ चुके थे ।सभी सवारियो ने कहा नहीं ...इसे पोलिस को दे दो ,
जिसका फोन चुराया था वो भी पुरे गुस्से में उसपर आगबबूला हो रहा था ,उसने उसे कहा तुझ जैसे चोरो की जगह जेल ही हे में अभी पोलिस को फोन करता हु सब कहने लगे हा करो करो ....
पता नहीं क्यों ये मुझे अच्छा नहीं लगा मेने उसका फोन पकड़ते हुए कहा जाने दो ,तुम्हारा फोन मिल गया यही बहुत बड़ी बात हे बाकी इसके कर्म इसके साथ तुम मुझे धन्यवाद देना चाहते हो तो इसे छोड़ दो , (मै अपनी ब्लैक कलर की राजपुताना ब्रेण्ड वाली हूडी पहने हुए था जिस पार आगे *जय राजपुताना* और पीछे #क्षत्रिय लिखा था ।)

तब उसने मुझसे कहा "ठीक हे ठाकुर साहब आपके कहने पर इसे छोड़ दिया मेने"।

अब मेने उस चोर को कहा कि तुम्हारी उम्र तीस पैंतीस साल की होगी तुम्हे शर्म आनी चाहिए ऐसा घिनोना काम करते हुए ।

उसने सिर्फ इतना कहा थैंक्यू छोटे भाई ।
मेरठ स्टेशन आ गया था ट्रेन धीमी ही हुई थी की वो उतर गया ।

सबने मुझे बहुत सराहा और कहा बहुत बढ़िया ठाकुर साहब सच में मुझे कल बहुत गुड़ फील हुआ ,

लेकिन एक बात खटकती रही कि मेने उस चोर को यू ही छोड़ दिया, ये गलत किया या सही ..??

---------------------------कुँवर मोहित राणा


ईरान की एक घटना ने मुझे सिखाया मानवता क्या होती हे



ईरान की एक घटना ने मुझे सिखया मानवता क्या होती हे ......

**********दृश्य -1***********

में भूषर से सुबह 6.30 मिनिट पर आबादान इंटरनेशनल एअरपोर्ट के लिए निकला ।
शाम 4 बजे की मेरी फ्लाईट थी ।
में अपने वतन भारत  लौट रहा था मन में एक नए उत्साह के साथ । लगभग 6 घंटे का मेरा सफर था इंटरनेशनल एअरपोर्ट तक का । इसलिए मेने सुबह 6.30 की एक लग्जरी बस पकड़ी मेरे अनुमान से उसे 1 बजे तक इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर पहुचना था । लेकिन उसका वास्तविक टाइम 7 घंटे था भूषर से आबादान तक के लिए । जब बस ने मुझे आबादान पहुचाया तो लगभग डेढ़ बज चुका था अब मुझे लगा के कही flyt न मिस हो जाए । इमिग्रेशन के लिए काउंटर पर डेढ़ घंटे पहले पहुचना पड़ता हे यानी मुझे 2.30 पर एअरपोर्ट पहुचना था ।
और बस ने मुझे एअरपोर्ट से 8 किलोमीटर पहले उतार दिया था । बस ड्राईवर ने बताया की यहाँ से मुझे एअरपोर्ट के लिए टेक्सी पकड़नी होगी ।
में टेक्सी की तलास में वहा खड़ा रहा लगभग 15 से बीस मिनिट तक।मेरी बेचैनी समय के साथ साथ बढ़ती जा रही थी ।मन में यही भय था कि flyt न छूट जाए ....... तभी मुझे एक टेक्सी दिखी मेने उसे तुरंत हाथ का इशारा किया ...उसने मुझ से पूछा कहा जाना हे मेने बताया की मेरे पास मात्र 10 या 20 मिनिट हे मुझे एअरपोर्ट पहुचा दो । उसके पास पहले से ही 2 सवारी थी जो दूसरे रुट की थी ।
उसने मुझे कहा की माफ़ करना मेरे पास दूसरे रुट की सवारी हे में नहीं जा सकता ।
यह सुनकर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा । मुझे लगा में अब हिंदुस्तान नहीं पहुच पाउँगा ।
टेक्सी ड्राईवर टेक्सी लेकर चल पड़ा ......
लेकिन कुछ दूर चलते ही उसने तुरंत गाडी बेक की और मेरी तरफ आया ।उसने अपनी पहली दो सवारी को वही उतरने के लिए बोला और कहा की पहले में इस हिंदी (यानि मुझ हिंदुस्तानी ) को
एअरपोर्ट छोड़ आउ और बाद में तुम्हे छोड़ आऊंगा तुम बस यही वेट करो ।
उसने मुझे इशारा करते हुए कहा जल्दी गाडी में बैठो , मेने तुरंत अपना लगेज गाडी में रखा और बैठ गया ।
उसने गाडी एअरपोर्ट की तरफ मोडी और चल पड़ा ....मुझे लग रहा था की शायद ये मुझसे ज्यादा किराया वसूलेगा क्योंकि इसने मेरे लिए अपनी दो सवारी को कष्ट जो दिया था।
उसने मुझसे अचानक पूछा तुम हिंदी हो ....मेने कहा हां ....फिर उस ईरानी ने हँसते हुए टूटे फड़के शब्दों में  एक हिंदी सांग गया ....डील मेले थू दीवाना हे .....।
उसने अमिताब बच्चन जी का नाम लिया और कहा की वो उसका फेवोरिट हीरो हे ।
बाते करते करते एअरपोर्ट आ गया ......मेने घडी में टाइम देखा तो समय 2.35 हो रहा था ।
मेने राहत की सांस ली और जल्दी जल्दी में उससे किराया पूछा ।
तब उस ईरानी ने दोनों हाथ जोड़कर मुझे नमस्थे कहा ....में आश्चर्यचकित रह गया ...मेने पुनः फ़ारसी में पूछा ....#सुमा_चकत_पूल_मखाय यानि (तुम्हे कितने पैसे चाहिए )
तब उसने पैसे लेने से मना कर दिया और कहा सुमा हिंदी पूल लाजिम नदारी यानि वो यही कहना चाहता था की तुम हमारे मेहमान हो और में तुमसे पैसे नहीं ले सकता इंसानियत के नाते ये मेरा फर्ज था में तुमसे किराया नहीं लूंगा तुम हँसी ख़ुशी अपने देश लोटो....उसकी ये बाते सुनकर में हतप्रभ रह गया ।
मेरे दिल से उस ईरानी के लिए सेल्यूट निकला ।
लेकिन में भी एक हिंदुस्तानी था अपना फर्ज कैसे भूल सकता था भला .? हमारे संस्कार भी इतने कमजोर तो नहीं ।
मेने पुन पुछा अच्छा ये ही बता दो की जहा से में बैठा हु वहा से यहाँ तक का कितना किराया होता हे ?
उसने मुझे हाथ खोलकर इशारा किया ..कि पाँच #खुमैनी ।

मेने कहा ठीक हे ....ये लो #दस खुमैनी ...उसने फिर मना कर दिया तब जबरदस्ती से मेने उसकी पॉकेट में 10 खुमैनी रख दी !
उसके सत्कार को देखते हुए मेने भी अपना कुछ कर्तव्य समझा और दोगुना किराया देकर एक संस्कारित हिंदुस्तानी होने का परोक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किया ।
और हर्दय से उसका आभार व्यक्त कर एअरपोर्ट की और निकल पड़ा ।

***************दृश्य - 2***************

जैसे ही में मुम्बई के इंटर नेशनल एअरपोर्ट  पंहुचा  मुझे बड़ा ख़ुशी का अहसास हुआ ।
और एक बार फिरसे उस ईरानी टेक्सी ड्राईवर को धन्यवाद दिया ...

अब मुझे एअरपोर्ट से c.s.t के लिए निकलना था ....जैसे ही में एअरपोर्ट के बहार आया तो मेने ओटो पकड़ी उससे मेने किराया पूछा तो उसने डेढ़ हजार रूपये बताया ...में हैरान रह गया क्योंकि ये बहुत ही एक्सपेंसिव था ....।

खेर एक पोलिस वाले को कहकर मेने ओटो कराया तब उसने मुझसे 150 रूपये लिए ।
अब मेने दोनों घटनाओ का तुल्यात्मक अध्यन किया ।
और पाया यदि मेरी जगह कोई विदेशी होता तो वो ओटो ड्राईवर उसकी जेब को चूहे की तरह कुतर डालता । और हर रोज विदेशियो के साथ होता भी यही हे  मुम्बई हो या डेल्ही सब जगह ..।

क्योंकि हम भारतीयो के अंदर मानवता मर चुकी हे ...वरना अतिथि देवों भवः कहने वाला देश
अपने अतिथियों के साथ ऐसा व्यवहार न करता ।
मानवमूल्यों की कद्र अब भारत में न के बराबर हे सबको अपना पेट भरने की लगी हे ....चाहे दोगले नेता हो या आम इंसान ..!

लेकिन उस ईरानी ने ये जरूर सीखा दिया ...........................कि हम भारतीय अपनी संस्कृति को भूल चुके हे ..........मानवता ,इंसानियत और परमार्थ बस सब्दो में सिमट कर रह गया हे ।

शेयर जरूर करे मित्रो ताकि हमारी मरी हुई इंसानियत में थोड़ी चेतना आ सके..

-------------------------कुँवर मोहित राणा


मेरे बीते कल का स्वर्णिम दौर


मेरे बीते कल का एक स्वर्णिम और मीठा अनुभव अवस्य पढ़े और पूरा पढ़े.......

में कुँवर मोहित राणा आज अपने जीवन के उन कर्मो का मूल्यांकन करने जा रहा हु
जो कर्म मेने आप सबके समक्ष किये ! इसलिए मेरे इन कर्मो का मूल्यांकन अब आपके हाथो में हे
मेरी अच्छाईयां ही नहीं अपितु मेरी बुराइयो को सुनना में कुछ ज्यादा ही पसंद करूँगा.....
अतएव आप सब मेरी बुराइयो पर भी स्वतंत्र होकर प्रकाश डालना !
आप सबकी लेखिनी से लिखा हर वो शब्द मुझे सदैव ये स्मरण कराता रहेगा कि मैं जहां रहा वहा मेने कितना प्यार बिखेरा अथवा कितना प्यार बटोरा..!
प्रिय स्नेही मित्रो  मेरे छोटे भाइयो अथवा प्यारे जूनियरों "मैं आप सबके प्रेम का कृतघ् व आभारी हु ...................

मुझे पता था कि वो रास्ते कभी मेरी मंजिल तक नहीं जाते थे !
फिर भी में चलता रहा क्योंकि उस राह में कुछ अपनों के घर भी आते थे !!

जितनी भीड़ बढ़ रही ज़माने में !
लोग उतने ही अकेले होते जा रहे हे !!

जीवन में सबसे कठोर दौर यह नहीं होता हे ! जब कोई तुम्हे समझता नहीं हे !
बल्कि यह तब होता हे जब तुम अपने आप को नहीं समझ पाते ..!!

सदैव अपनी  छोटी छोटी गलतियों से बचने की कोशिश करे ..
क्योकि इंसान पहाड़ो से नहीं छोटे छोटे पत्थरो ठोकर खाता हे..!!

ऐ मुसीबत ला तेरे पेरो को मरहम लगा दू क्योकि ...
तुझे भी तो चोट आई होगी मेरी किस्मत को ठोकर मरकर..!!

"मेरी उम्र अभी मात्र 24 या 25 वर्ष की ही होगी किन्तु अपनी उम्र के इस छोटे से पड़ाव में मेने जो अनुभव किये उनमे से एक मुख्य "अनुभव" को मै यहाँ अपनी लेखिनी के माध्यम से कहना चाहूँगा
ये तो जीवन चक्र हे मुझे पता हे और आप सब भी जानते हो जीवन आनी जानी माया हे !
जो चलता रहता हे और आगे भी चलता रहेगा समय किसी के लिए नहीं ठहरता......!
लेकिन एक अनुभव जो मेने किया उसको आज में आप सब से कहूँगा - मेरे प्रिय स्नेही मित्रो व मेरे छोटे भाइयो (जूनियर्स) एक समय मेरी जिंदगी में ऐसा आया जब मुझे लगा की ये समय शायद रुक गया हे ! मानो जीवन बस यही हो जिंदगी ठहर सी गयी हो जैसे ! जी हां ये वो समय था जब मै एक स्टूडेंट था और जब तक में स्टूडेंट रहा तब तक जिंदगी और समय की रफ़्तार को न भांप सका ! शायद इसलिए क्योकि मै अपने जीवन के उस स्वर्णिम दौर को जी रहा था जिसमे केवल खुशिया ही खुशिया थी ! खुशियो के सिवा कुछ था ही नहीं कब दिन होता कब रात होती कुछ पता ही नहीं चलता था !
मै आशाओ के अपने उस नये जीवन को जी कुछ इस प्रकार से रहा था  जैसे ÷
किसी बीज का जमीन की भूर - भूरी मिटटी से अंकुरण हो रहा हो !
और उसकी प्यारी प्यारी कोमल नन्ही पत्तिया जैसे इस नई जिंदगी को अपनी बाँहो में लेने के लिए हाथ फ़ैला रही हो ! वेसे ही मेरी आशाओ और नई चेतना के कारण मेरी आँखों में एक चमक पैदा हो रही थी !!
मानो में भी इस दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने के लिए तैयार बैठ था ! लेकिन वो समय कब बीता कुछ पता ही नहीं चला ! इसलिए मुझे लगा की शायद उस पल जिंदगी विराम अवस्था में हो
कितनी मस्ती के दिन होते थे वो सच आज भी स्मरण करते ही आँखे गीली हो आती हे !
उस स्वर्णिम दौर की यादे आज भी मेरी स्मृति  में शेष हे ! और शायद अब तो सदैव ही मेरी स्मृति में जीवित रहेंगी ! वो रूम में मस्ती करना दिन भर घूमना और फिर रात को देर तक न सोना घंटो तक झगड़ना किसी के सोते हुए कान खीचना तो किसी के बाल नोचना किसी की रजाई खीचना तो किसी का बिस्तर खिसकाना ! वो घंटो केन्टीन में बैठे रहना और चाय पे चाय पीना
वो क्लास की मस्ती किसी का पेन गुम हो जाना तो किसी की शर्ट पे टेटू बनाना !
टीचर को परेशान करना और एक दूसरे की अटेंडेंस लगा आना बगैर कॉलेज जाए ही class कर आना ! और हाँ वो नोटिस बोर्ड पर गलत सुचना चिपका आना और होस्टल में चुपके से घुस जाना आज भी सब कुछ याद हे .........!!!!!
आज भी ये सब घटनाये मेरे दिल और दिमाग में इस तरह से जिन्दा हे जैसे कल ही की बात हो
कितना मस्ती भरा समय था वो जैसे हम सब दोस्त एक परिवार हो ! एक ऐसा परिवार जिसमे रिश्ते खून के रिश्तों से भी ज्यादा मजबूत होते थे ! चोट दोस्तों को लगती थी लेकिन दर्द हमे होता था ! वास्तव में आज भी अपने उस समय को बहुत मिस करता हु ! लेकिन क्या करू समय की इस रफ़्तार के आगे में हार गया ! सब कुछ झूट गया एक झटके में जैसे ! नहीं तो मुझे आज भी याद हे - वो पल जब गलती एक करता था और पता होते हुए भी पिटते सारे थे ! अब आप ही बताओ कहा मिलेगा ऐसा प्यार .? कहाँ मिलेगी ऐसी एकजुटता ? कही नहीं खूब खोज कर लेना
सिवाय स्टूडेंट लाइफ के और कही नहीं मिलेगी !
इतना समर्पण इतना त्याग इतना सहयोग और कही नहीं मिलेगा जीतना आपको इस स्टूडेंट लाइफ में मिलेगा ! अब ओरो का तो मुझे नहीं पता किन्तु ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव हे !जो मेने किया
आप सब इससे कितना सहमत हे ये तो तब ही पता चलेगा जब आप इस जिंदगी को जी चुके होंगे
शायद में आपको दिखा नहीं सकता किन्तु मेरी आँखों में लिखते हुए अब भी आँशु हे !
उस पल को याद करते हुए में भावुक हो जाता हु ! शायद अब ये मेरी प्रकृति बन चूका हे ! जिसे बदल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हे ! और अब आप सबका इतना प्यार पाकर में खुद को बहुत भाग्यशाली समझता हु ! तुम सबने मुझे मेरे कॉलेज लाइफ की याद दिला दी अब में उस समय में वापस तो नहीं जा सकता इसलिए ही तुम सबमे अपने आप को खोजता रहता हु !
मेरी हालात उस मृग की भाँती हे जो कस्तूरी की सुगंध में जंगल जंगल भटकता रहता हे किन्तु उसे उसकी सुगंध के सिवा और कुछ न प्राप्त होता हे ! क्योकि वो कस्तूरी उसी के अंदर हे अब मुझे पता होते हुए भी उसी अहसास को पाने के लिए तुम सबके बीच आ जाता हु ! भले ही मुझे मेरा बिता कल वापस न मिलता हो लेकिन वो कस्तूरी की सुगंध का सुखद एहसास मिलता हे !
जिसे पाकर कुछ हद तक मेरी तृष्णा शांत हो जाती हे !आज भी ऐसा मन करता हे आपको किन शब्दों में बताऊ शायद ये मेरी भावनाओ की ही आवाज हे जो मेरे जैसे किसी हृद्यघाति ने कहे हो
आज मेरी भी यही इच्छा हे ----------

शायद फिर वो तकदीर मिल जाए जीवन के वो हसीन पल मिल जाये !
चल फिर बैठे क्लास की लास्ट बेंच पे शायद वो पुराने दोस्त मिल जाये !!

अब तो बस जैसे यही एक ख्वाहिस बची हो...जैसे मेरा रोम रोम इसे ही अब हर समय  महसूस करता हो ! मानो ये शब्द मेरे ही हे...........

याद आते हे वो स्कूल के दिन ! ना जाते थे स्कूल दोस्तों के बिन !
कैसी थी वो दोस्ती कैसा था वो प्यार ! एक दिन की जुदाई से डरते थे जब आता था शनिवार
चलते चलते पत्थरो पर मारते थे ठोकर ! कभी हंसकर चलते थे तो कभी नाराज होकर
कन्धे पर बेग लिए हाथो में बोतल पानी !
किसे पता था बचपन की दोस्ती को बिछुडा देगी जवानी !!
याद आते हे वो रंगो से भरे हाथ ! क्या दिन थे वो कभी लंच करते थे साथ !
छुट्टी की घंटी बजते ही भागकर बहार आना फिर हस्ते हस्ते दोस्तों से मिल जाना
काश वो दिन फिर लौट आते ! दिल में बचपन के फूल फिर से खिल जाते ..
काश वो दिन फिर लौट आते.........काश वो दिन...........

शायद ऐसा हो पता और वो दिन मुझे फिर से मिल पाते तो मेरी बस यही इक  इच्छा  होती कि चलो यारो तैयार हो जाओ फिर से स्कूल की बैंड बजानी हे  !!
पर काश इसा हो पता ? इसलिए मै तो सिर्फ अपने आप से और आप सब से यही कहना चाहूँगा--

कुछ सालो बाद ये पल बहुत याद आएंगे !
जब हम सब दोस्त अपनी मंजिल पर पहुच जायेंगे !
अकेले जब भी होंगे साथ गुजरे हुए लम्हे याद आएंगे !
पैसे तो बहुत होंगे पर शायद खर्च करने के लिए लम्हे कम पड़ जायेंगे !
इक कप चाय याद दोस्तों की दिलाएगी .!
यही सोचते सोचते फिरसे आँखे नम हो जाएँगी !
दिल खोलकर जी लो यारो ..........
जिंदगी अपना इतिहास फिर नहीं दोहरायेगी.......!!

क्या करु आखिर अब इन यादो का ..? क्योकि इन्हें अब में भुलाना भी तो नहीं चाहता !
क्योकि ये वो यादे हे जो मेरी जिंदगी में चार चाँद लगा गयी ! अब तो सिर्फ में इन यादो को संजोकर रखना चाहूँगा और आपको भी मेरा एक सन्देश हे--- प्यारे दोस्तों इन लम्हों को जी भर के जियो और खुलकर जियो ताकि आप भी मेरी तरह स्मरण करते समय गर्व् महसूस करो /

और वो शरारत तो आज भी याद हे ...जब टूथपेस्ट को जलाकर उसे छत से चिपकाना !
जैसे स्टूडेंट के रूम की यही पहचान हो कोई भी वो काली धब्बों वाली छत को देखकर कह देगा की ये किसी स्टूडेंट का रूम रहा होगा .! ऐसी थी हमारी कॉलेज की लाइफ जिसे हमने जी भरके जिया .......

रोज रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ा हु !
ऐ मुश्किलो देखो में तुमसे कितना बड़ा हु .!!
मेरी तरह आप भी ये जज्बा रखो और जिंदगी से कहो ......
जिंदगी सुन तू यही पे रुक हम जमाना बदलकर आते हे !
मेरे प्यारे दोस्तों अब वक़्त आपके हाथो में हे ! क़ैद कर लो हमेसा के लिए इस वक़्त को  अपने हाथो में और  जी लो अपने स्वर्णिम दौर को ! बस आप सबसे मेरी एक विनती हे की आप भी मेरी  यादो में साझेदारी निभाना चाहते हो तो में आपको एक अवसर देता हु अपनी डायरी लिखने का अगर आप ऐसा करते हो तो यक़ीन मानो आप हमेसा के लिए मेरी स्मृति पटल पर छाप छोड़ जाओगे ..! सिर्फ मेरे लिए उस ईस्वर से एक प्रार्थना करना कि वो मेरे दोस्तों और छोटे भाइयो (जूनियर्स) को हमेसा खुश रखे !!
आपका अपना भाई..........
____________________________________________लेखक - कुँवर मोहित राणा

(मेरी डायरी का एक अंश यह लेख spcl मेरे दोस्तों और जूनियर्स के लिए)


मेरा फैलो ट्रैवलर


मेरा फैलो ट्रैवलर *

कल मेने डेल्ही से मुज़फ्फरनगर के लिए साढ़े ग्यारह बजे अमृतसर इंदौर ट्रेन पकड़ी , ट्रेन से अचानक सफ़र करना पड़ा तो जल्दी में  AC कोच की टिकिट बुक न करा सका , चमचमाती गर्मी में जनरल डब्बे की और देखने से ही उमस पैदा हो रही थी , बैठना तो बहुत दूर की बात खड़े होने तक की जगह न थी , ये सब दृश्य देखकर में आवेशित हो उठा और मन ही मन सोचने लगा की यूरोप के देश हमसे कितना आगे निकल चुके और हमारी व्यवस्था आज भी बेलगाडी की तरह हे । बस यही सोचते हुए में आवेश में आकर आरक्षित कोच में जा घुसा और सोच लिया की जो होगा देखा जायेगा , खेर में आरक्षित डब्बे में एक बुजुर्ग महिला की सीट पर जा बैठा और उसने भी मुझे वहा बैठने की अनुमति दे दी , मै अकेला बैठा ऊब सा रहा था , तभी मेरी नजर मेरे सामने वाली सीट पर बैठी एक मासूम से बच्ची पर पड़ी , में उसकी हरकतों को बड़े ध्यान से एक टक देखने लगा कभी वो सीट पर से उतरती तो कभी सीट पर ऊपर चढ़ती , एक पानी की बोतल को वो इधर उधर उठाकर फेंखते हुए मेरे पास आ गयी अचानक से उसने मुझे देखा और फिर वो एकटक मुझे देखती रही , उसके मासूम से चेहरे को मेने छूना चाहा लेकिन जैसे ही मेने हाथ आगे बढाए तो वो तुरंत पीछे की और घिसक गयी मानो जैसे किसी पुष्प ने अपने आप को पत्तियो में समेट लिया हो ,
लेकिन उसकी नजरे मुझे ही देखती रही उसकी चहल कदमी भी शांत हो गयी थी , अब हम दोनों एक दूसरे को दूर से ही देख रहे थे , बहुत देर से में यही सोच रहा था की कोई फेलो ट्रैवलर मिले तो मेरा सफ़र आसानी से कट जाए ,
खेर उस मासूम सी बच्ची को देखने के बाद मुझे अहसास हुआ की मुझे मेरा फेलो ट्रैवलर मिल गया हे ।
तभी मै अपने बेग से चने निकालकर खाने लगा , अब वो गुड़िया मुझे चने खाता देख अपनी सीट से उतरकर मेरे पास आ बैठी , वो एक टक मुझे देख रही थी उसके और मेरे बीच में चने से भरी पॉलीथिन थी वो चनो को देखती फिर मुझे देखती , उसके मासूम से और प्यारे से चेहरे को देखकर में आनंदित हो रहा था , अब हम दोनों अपनी नजरो से ही एक दूसरे से बात कर रहे थे , मानो उसकी निगाहें यही कह रही थी की क्या में भी तुम्हारे ये चने ले सकती हु ,
मै उसकी इस मासूम सी हरकत को देखकर मुस्कुराया, मेरा मुस्कुराना उसके लिए अनुमति का काम कर गया , उसने तुरंत अपने नन्हे से हाथो से चने मुट्टी में उठाये , उसकी नन्ही सी मुठ्ठी में मुश्किल से 3 या 4 दाने आये होंगे , प्रकृति की इस सुंदरता को देखकर में लोलीन हो रहा था, उसके वो हाथ चने उठाने के लिए कुछ वैसे ही खुले थे जैसे किसी बीज का भुरभुरी मिटटी से अंकुरण हो रहा हो और उसकी नन्ही कोमल पत्तिया सारे संसार को अपने आगोश में लेने के लिए खुली हो , बस प्राकृतिक सुंदरता की इस अनमोल धरोहर को में निहार रहा था , उसने जैसे ही वो चने से भरी मुठी अपने मुह की और खाने के लिए की तभी उसकी माँ ने उसे झिटक दिया और उसे मेरे पास से उठाकर अपने पास ले गयी और उसे झुंझलाते हुए उसकी सीट पर दे पटका , उसकी मुट्ठी  के वो चने जमीन पर गिर गए थे
वो जमीन पर गिरे उन चनो को देख रही थी , उसकी आँखों में एक उदासी सी छा गयी उसकी आँखे एकदम नम हो चुकी थी शायद वो अब रोने ही वाली थी तभी उसने मुझे देखा ,
मेने गर्दन हिलाई और अपनी आँखों से उसे मना करते हुए पलक झपके ,
वो रोइ तो नही लेकिन उसकी नम आँखों के दो आंशुओं को में रोक न सका , मुझे बड़ा ही दुःख हो रहा था आखिर क्या गलती थी हम दोनों की
यही की उसने मुझे अपना फेलो ट्रैवलर चुना ..?
उसके इस स्वतंत्रता के अधिकार को छीनने वाली उसकी माँ का ये कार्य आखिर कहा तक उचित था .?
उस नन्ही सी कली की इच्छाओ का दमन करने का अधिकार
आखिर प्रकृति ने तो नहीं दिया ..?

तभी उसकी माँ ने अपने बेग से एक #पूरी निकाली और उसके हाथ में थमा दी , उसे लगा की वो भूकी हे शायद इसलिए मेरे पास चने खाने चली गयी होगी , लेकिन नही उसकी माँ पूरी तरह गलत थी , उसने मुझे अपना दोस्त चुन लिया था और वो सिर्फ मुझे कम्पनी देने के लिए मेरे पास आई थी ताकि वो मेरे साथ चने खाना साझा कर सके
क्योंकि में उसका फेलो ट्रैवलर था ,
उसने उस #पूरी को हाथ में जरूर लिया लेकिन खाया नही ,
वो पूरी को अपने दांतो से काटकर इधर उधर फेंकने लगी ,
उसका खिलखिलाता चेहरा अब स्पष्ट रूप से उदास था ।
लेकिन उसकी मासूम निगाहें अब भी मुझे देख रही थी .................

चित्र सलग्न ,

---------------कुँवर मोहित राणा



एक इंजीनियर की पकौडी


बात उन दिनों की हे जब में सिविल इंजीनियरिंग का छात्र था,  इंजीनियरिंग करने का एक फायदा तो हे, हमे इंजीनियरिंग आये या न आये लेकिन खाना बनाना जरूर आ जाता हे ।
इसलिए मेने देखा की जो स्टूडेंट इंजीनियरिंग को अपना कैरियर नही बना पाते वो एक ढाबे या रेस्टोरेंट का संचालन अच्छे से कर लेते हे ।
अब हुआ यु हमारा भी इंजीनियरिंग का प्रथम वर्ष था होस्टल न मिलने के कारन रूम हायर करके ही रहना पड़ा , अब स्टूडेंट के सामने सबसे बड़ी प्रोब आती हे खाने की ,खाने का एडजस्टमेंट कर पाना बड़ा ही मुश्किल होता हे , खेर मेरा शौभाग्य ये रहा की मेरा एक दोस्त पास आउट था, जिस वजह से उसे खाना बनाना अच्छे से आता था , वास्तव में वो लजीज और जायकेदार खाना बनाया करता था , मेकेनिकल इंजीनियर होने के साथ साथ वो एक अच्छा कूक भी था ,इसलिए आरंभिक दिनों में मुझे खाने की ज्यादा प्रॉब्लम न हुई , सुबह शाम टाइम से मेरा दोस्त जायकेदार खाना उपलब्ध करा दिया करता था ,
अब सब कुछ सही जा रहा था कि अचानक कुछ दिन बाद उसे अपने घर जाना पड़ गया, अब खाना बनाने की समस्या मेरे सामने आ खड़ी हुई , शर्दीयो के दिन थे कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी हल्की हल्की बूंदाबांदी भी हो रही थी मेरा एक रूम पार्टनर और था जो उम्र में मुझसे बहुत छोटा था, उसने मुझसे कहा भाई चलो आज पकोड़ी बनाते हे  शर्दी हो रही हे और पकोड़ी खाने का मन हे , अब पकोड़ी का नाम सुनते ही मन में चटपटे स्वाद घूमने लगे मेने उसके सुझाव पर ISI मार्क की मोहर मरते हुए हां भर दी , और योजनाबद्ध तरीके से पकोड़ी बनाने के सामान जुटाने लगे , पिछली शाम खाना न खाया था और आज भी दोपहर हो चली थी भूक जोरो पर थी पेट के चूहे जैसे हम पर चिल्ला रहे हो "नालायको खाना तो दो कबसे भूका रखा हुआ हे" और हम जैसे उन्हें कह रहे हो शांत रहो हम एक लजीज खाने का बन्दोबस्त कर रहे हे फिर भरपेट खाएंगे ।
अब सामान की लिस्ट लिखी जा रही थी - आधी किलो बेसन 
आधा किलो आलू (पहले तो इसी बात पर बहस होती रही की पकोड़ी कम न बने ज्यादा भले ही रह जाये पेट भर के खानी हे
फिर आधा किलो पर ही सहमति बनी) ढाई सौ ग्राम प्याज , इस तरह लगभग सभी सामान नोट किये गए तभी मेने कहा अरे चटनी या सॉस भी लिख उसके बिना पकोड़ी का मजा नही आने वाले  उसने तेजी के साथ चटनी को भी ऐड कर लिया।
वैसे भी गर्मा गर्म आलू की पकोड़ी हो और साथ में खट्टी मीठी चटनी ऊपर से शुहावने मौसम में रजाई में बैठकर खाने का अपना अलग ही मजा हे ।
सामान रेड़ी करते हुए हमने आलू बेसन को काट पीटकर मिला लिया , गैस को चालु किया (अबसे पहले मेने पकोड़ी तो बहूत दूर की बात चाय तक न बनाई थी ये मेरा पहला कूकिंग का अवसर था, लेकिन में पुरे आत्मविस्वास के साथ पकोडी बनाने लगा जैसे-बहुत बड़ा अनुभव मेरे पास हो)

कढ़ाई हमारे पास थी नहीं कूकर था सो कूकर को ही पकोड़ी बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया , कूकर को गैस पर रखते हुए उसमे सिंड्रोम सिफोला का रिफाइन्ड डाला गया   बस फिर क्या था उसमे में बेसन आलू का घोल छोड़ता गया ,
थोड़ी थोड़ी देर बाद बेसन में लिपटे आलू उठाता और कूकर में डालता जाता , लगभग डेढ़ किलो का सामान यानी बेसन आलू में उसमे छोड़ चूका , और निकालना ध्यान नहीं रहा मेने सोचा एक पार पक जाये तो सारी पकौड़िया अच्छे से एक बार ही बहार निकाल लेंगे ,
सारा बेसन आलू छोड़ने के बाद मेने सोचा चलो अब पकौड़ियों को थोडा सा हिला झूला लिया जाए ,तब मेने चमचा उठाया और कूकर में देकर जो घुमाया अब ये क्या  पूरा कूकर एक साथ मूव करने लगा ,
यानी कूकर में पकौड़िया नहीं बल्कि एक बड़ा पकोड़ा था  अब ये क्या हो गया .? हमने तो पकोड़ी बनाई थी लेकिन। ये कोनसी पकोड़ी हे .? कूकर को गैस पर से उतार कर बहार उजाले में लाकर देखा तो पाया जैसे कूकर के अंदर पकौड़ियों का राजा अपना पिछवाडा जमाये बैठा हो , 
पुरे कूकर में डेढ़ किलो की एक पकोड़ी थी , अब में करता भी क्या अबसे पहले ससुरा चाय तक न बनाई थी , खेर जो भी हो भूक जोरो पर थी एक युक्ति दिमाग में आई क्योंकि न इस पकोड़े को तोड़फोड़कर बहार निकाले और फिर खाये ,
हम दोनों जैसे चट्टान को तोड़ते हुए छोटे छोटे पथरो को अलग करने लगे , अब जैसे ही उसे चख कर देखा तो लगा कि गयी भैंस पानी में , बेसन तो ठीक लेकिन आलू अंदर से एकदम कच्चे और बकबके थे , बड़ा ही दुःख हुआ सारी चटपटी योजना पर पानी फिर गया , जैसे गत लोकसभा चुनाव में कोंग्रेस ने बीजेपी के हाथो करारी शिकस्त खा ली हो , हम भी अपने उस कूकर को उठाकर पड़ोस में आंटी जी की गांय की खोर में डाल आये एक बार तो गांय ने हमारी तरफ देखा लेकिन जैसे ही जीभ से उन पकौड़ियों को चाटा उसके बाद तो सारा चट ही कर दिया हम दूर खड़े उसे देखते रहे और अपनी खट्टी मीठी चटनी और पकौड़ियों के स्वप्न को बुनते रहे, पेट के चूहे तो अब उछल कूद करके मर चुके थे , बड़ा बुरा श्राप दिया उस दिन ससुरो ने ,
पेट के चूहों की हत्या का कारण आखिर हमारी अज्ञानता ही तो थी ,

आज भी कभी कभी शर्दीयो में उन चटपटी पकौड़ियों का स्मरण हो आता हे ।

-----------------कुँवर मोहित राणा


मेरी वो मासूम सी दोस्ती


आज में अपने जीवन के सबसे पुराने उन पलो को लिखने जा रहा हु जब मेरी उम्र मात्र 6 या 7 साल की थी ।
साफ़ साफ़ कह सकते हे की वो मेरा बचपन था ,19 साल बीत गए लेकिन आज भी कभी कभी उन पलो के धुंधले धुंधले से चित्र आँखों के आगे तैरने लगते हे, ज्यादा तो उस समय का कुछ याद नही लेकिन जो याद हे आज लिख रहा हु ,
मेरे दादा जी बहुत ही सिद्धांत वादी इंसान थे और बहुत कड़क मिजाज भी इसलिए अपना सब कुछ होते हुए भी किन्ही कारणों से पापा को घर छोड़ना पड़ा था , और पानीपत में जाकर नोकरी करने लगे थे , बस मेरी आरंभिक शिक्षा भी वही पर हुई थी , उस समय हमारी आर्थिक स्थित बहुत कमजोर थी , उसके बावजूद भी मेरे माता पिता ने मुझे एक अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया,उस समय मेरी मंथली फीस 50रूपये थी
जबकि उस समय में लोग प्राथमिक विद्यालयो में 2 रूपये महीना तक नही दे पाते थे ।
खेर मुद्दे की बात पर आता हु आज क्यों में ये सब लिख रहा हु ? और किसके लिए लिख रहा हु .....

उस समय एक नाम ऐसा था जिसके सिवा में किसी और नाम को नही जानता था , वो नाम था #विक्रम

विक्रम मेरा बहुत अच्छा दोस्त था ,और मुझे बहुत ज्यादा अमीर भी था । मुझे आज भी याद हे, वो आलू के पराठे और तरह तरह के खाने की चीजे अपने टिफिन में लाया करता था , लेकिन स्कूल आने7 के बाद वो मुझसे मेरा लंच बॉक्स ले लिया करता था और अपना लन्च मुझे दे दिया करता था , रेसिस (इंटरवल) होते ही हम दोनों दौड़कर रेलवे ट्रैक की तरफ जाते थे और पटरी के पास बैठकर खाना खाते ,वो मेरे सादे पराठे खाया करता था , जबकि उसके टिफिन में आलू के पराठो के साथ साथ फ्रूट भी हुआ करते थे मुझे उस समय ऐसा महसूस होता था जैसे वो दुनिया का सबसे रहीस बच्चा हो , उसके टिफिन को में बड़े तबियत के साथ चट कर जाता था विक्रम शायद मुझसे कुछ बड़ा था और शायद मुझसे थोडा समझदार भी,
रेलवे ट्रैक हमारे स्कूल के पास में ही था , जब भी कोई ट्रेन वहा से गुजरती तो हम दोनों झट से उसका नम्बर लिखने लगते थे, आप ये सोच रहे होंगे ऐसा क्यों..? क्योंकि विक्रम को किसी ने बताया था की अगर हम सौ ट्रेन के नम्बर नोट कर ले तो एकट्रेन हमारी हो जायेगी  ,
अब क्या करे हम नादाँन और मासूम थे , रेलवे ट्रैक पर जाना मना था लेकिन हम हर रोज जाया करते थे
वही लन्च करते और वही से पत्थर उठाकर कंटीली झाड़ियो पर मरते
एक बार हम दोनों को मेम ने रेलवे ट्रैक पर देख लिया उसके बाद जब हम क्लास में वापस लौटे तो मेडम ने हम दोनों को गुस्से में अपने पास बुलाया उस समय में पूरी तरह डर गया था
सबसे पहले मेडम ने मेरा कान पकड़ा और जैसे ही कान पर अपने दूसरे हाथ से तमाचा रसीद करने वाली थी तुरंत विक्रम ने कहा नही मेम इसको में लेकर गया था मनु की कोई गलती नही हे  , उसके बाद मेम ने मुझे तो छोड़ दिया लेकिन विक्रम को 5 छड़ी खानी पड़ी ।
में बहुत खुश था कि मेरी जान बच गयी , जबकि विक्रम बेचारा थोडा मायूस हो गया था उसके हाथ लाल हो गए थे छड़ी के निशान साफ दिख रहे थे ।

लेकिन उसके बाद भी हम दोनों ने रेलवे ट्रैक पर जाना न छोड़ा , में उसे मना करता था की में नही जाऊंगा मेम बहुत मारेगी वो मुझे यही बोलता तुझे नही पीटने दूंगा चल ना यार
में फिर भी नही जाता था लेकिन एक दिन किसी ने मुझे बताया की रेल की पटरी पर अगर 50 पैसे रख दे और ऊपर से ट्रेन गुजर जाये तो 50 पैसे चांदी के बन जाते हे ।
बस ये एक्सपेरिमेंट करने के लिए में उसके साथ एक बार और गया....।
विक्रम ने अपनी जेब से अठननी निकाली और पटरी पर रख दी ,
ट्रेन आने वाली थी हम झाड़ियो में छुपकर बैठ गए , जैसे ही ट्रेन अठन्नी के ऊपर से गुजरी हमारी उत्सुकता बढ़ने लगी ट्रेन गुजर जाने के बाद हम तेजी से पटरी की और दौड़े...और ये क्या सिक्का तो पूरी तरह पटरी से चिपका हुआ था और उसका आकार भी पहले से दो गुना था, जैसे ही उसे मेने छुआ तो मेरा हाथ जल गया ,
बड़ा दुःख हुआ एक्सपेरिमेंट फेल हो गया और सिक्के का भी नुकसान हो गया ,
खेर फिर हम हर रोज रेलवे ट्रैक पर जाने लगे ।
हम दोनों छुट्टी होने के बाद बर्फ का गोला खाया करते थे । पैसे हर बार विक्रम ही देता था , हम साथ खेलते थे सबसे अलग रहा करते थे , कभी लट्टू खुमाते कभी रेलवे ट्रैक पर जाकर पत्थर उठाकर इधर उधर फेंकते , कभी झाड़ियो में छुपते , समय के साथ साथ हम काफी अच्छे दोस्त बन गए थे , उसके पापा उसे स्कूटर पर स्कूल छोड़ने आते थे जबकि में पूरे 2 किलोमीटर पैदल जाया करता था ,
कभी कभी पापा मुझे साइकिल से छोड़ आते थे , वरना हर रोज पैदल ही जाया करता था , मेरी पीठ पर एक बहुत बड़ा बेग लदा रहता था , आज भी याद हे रस्ते में एक पुल पड़ता था उसकी चढ़ाई चढ़ने में मेरी हालत पतली हो जाती थी , गर्मियों में तो मै पसीने में लथ पथ हो जाया करता था लेकिन मेरी मेडम मुझे बहुत प्यार करती थी स्कूल में पहुचने पर वो सबसे पहले मुझे बुलाती और अपने दुपट्टे से मेरा मुह पोंछती थी ।
हर रोज की तरह में स्कूल जा रहा था जैसे ही में पुल पर चढ़ा तो मेने देखा विक्रम पुल पर खड़ा हे , में उसे देखकर बड़ा ही हैरान हुआ , उसने कहा अबसे में भी पैदल ही स्कूल जाया करूँगा तेरे साथ ,
बस फिर क्या फिर हम हर रोज स्कूल साथ जाया करते और साथ आया करते , वो हर रोज पुल पर खड़ा होकर मेरा वेट किया करता था , असल में पुल के रस्ते से हम दोनों के सस्ते अलग हो जाया करते थे ।
हम दोनों मासूम से बच्चे एक दूसरे के बेग पर मुह रखकर आया करते थे ,
और ये बोलते हुए बिल्ली बिल्ली तेरा घर कहा हे ......नीम के तले../

समय बीतता गया दादा जी का देहांत हो गया था ,सो हमे अपने घर वापस लौटना था , मम्मी ने मुझे बताया कि हम अपने गांव जायँगे कल , अब हम यहाँ नही रहेंगे , ये सुनकर में बहुत खुश हुआ की मेरा भी कोई गांव हे , मेने ममी से पूछा वहा हमारा घर हे ?, तब मम्मी ने कहा बहुत बड़ा इससे भी बहुत बड़ा जहा हम रहते हे , अब तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न था , में बस ये सोच रहा था की कैसे ही सुबह हो और में विक्रम को जाकर ये सब बता दू की मेरा भी बहुत बड़ा घर हे,

क्योंकि मुझे अबसे पहले नही पता था की हमारा भी बहुत बड़ा घर हे क्योंकि पापा ने शादी के तुरंत बाद घर और गाँव छोड़ दिया था ।

अब तो बस सारी रात में यही सोचता रहा की सुबह स्कूल में सबको बताऊंगा की में बहुत अमीर हु ,
बस फिर क्या सुबह हुई और में तेजी के साथ स्कूल के लिए तैयार हुआ ,
ममी ने मुझे मना कर दिया कि अब तुम स्कूल नही जाओगे आज हम अपने गांव जायेंगे , मेने ममी से कहा plz आज जाने दो भले ही पापा को भेज देना वो मुझे इंटरवल से ले आएंगे , खेर मम्मी ने मेरी बात मान ली और मुझे स्कूल जाने दिया ।
मेने स्कूल में जाते ही सबसे पहले ये खबर विक्रम को सुनाई , , वो मेरी बात सुनकर चुप चाप बड़े गोर से मुझे देखने लगा , में बहुत खुश था मेने उसे बताया की अब हम यहा नही रहेंगे अपने घर जायेंगे कल
1 घंटे तक में बक बक करता रहा मुझे लग रहा था की शायद उसे भी उतनी ख़ुशी मिल रही होगी जितनी मुझे ,
लेकिन में गलत था आज मुझे पता चला उसे कितना दुःख हुआ होगा
पापा अपनी साइकिल लेकर स्कूल में मुझे लेने आ गए थे..

मेने झट से बेग उठाया और मेडम को बाय बोलते हुए पापा की और दौड़ा ,

तभी पीछे से आवाज आई .......मनु

वो मुझे मनु बुलाया करता था ,
साईकिल पर बैठने से पहले में रुका ।
मेने पीछे मुड़कर देखा .........विक्रम की आँखों में आँशु थे , विक्रम रो रहा था....उसके आंशुओं का मुझपर लेश मात्र भी फर्क न पड़ा मेरे अंदर ख़ुशी का सागर उमड़ रहा था , इसलिए शायद उस समय उसकी भावनाओ को मै समझ न सका , वो अपने हाथ में HB की पेन्सिल लिए हुए था , उसने वो पेन्सिल आधी तोड़कर मुझे दे दी , मेने वो आधी टूटी पेन्सिल अपने नेहकर की जेब में रखली और में साईकिल पर जाकर बैठ गया , विक्रम बहुत जोर-जोर से रोने लगा , में दूर से देख रहा था मेडम ने उसे अपनी गोदी में लेते हुए उसे अपने गले से लगा लिया लेकिन उसका चिल्लाना नही रुका मनु......मनु....मनु

तब में बहुत छोटा था दोस्त ,
दोस्ती जैसी नाम की कोई चीज भी होती हे मुझे नही पता थी ,

लेकिन आज तुझे बहुत मिस करता हु दोस्त , तेरा चेहरा तो याद नही बस नाम याद और तेरा अहसान याद हे
और वो सब चीज याद हे जो हमने साथ में की आज भी किसी पुल से गुजरता हु तो लगता हे जैसे विक्रम खड़ा हो और वो मुझे मिल जाये ,
में तो बड़ा लापरवाह निकला दोस्त तेरी दी हुई उस अमूल्य धरोहर को भी संजोकर न रख पाया आज से 10 साल पहले मेने उस टूटी हुई पेन्सिल को खो दिया घर का चप्पा चप्पा कोना कोना खोजा लेकिन वो टूटी पेन्सिल न मिली  जिस दिन मेने उसे खोया उस दिन में बहुत रोया था।
क्योंकि मेने अपने जीवन के सबसे बड़े उपहार को जो खोया था ,

आज पता चला की वो मेरे लिए क्यों पीटा तब में खुश था लेकिन आज दुःख होता हे की एक भी बार में उसे  थैंक्यू नही बोल पाया ,
आज इसलिए लिख रहा हु क्योंकि शोशल मिडिया का जमाना हे उस समय मोबाईल जैसी कोई चीज न थी लेकिन आज हे और आज फेसबुक जैसा शोशल मिडिया का सशक्त माध्यम भी हे , हो सकता उसका भी फेसबुक अकाउंट हो , और मेरी ये पोस्ट उसके अक्काउंट से टकरा जाए अगर मेरी ये पोस्ट तुम तक पहुच गयी दोस्त......तो समझ लेना तुम्हारा ये दोस्त मनु तुम्हे आज बहुत मिस करता हे ।

........................तुम्हारा दोस्त मनु

एक किसान धरती पर सबसे अमीर इंसान होता हे


में बचपन से अपने कृषक जीवन को बड़ी ही निम्न दृष्टि से देखता था , मेरे पिताजी पैशे से किसान ही थे और अभी भी हे इसलिए बचपन में किसान का बेटा होने के कारण कभी कभी खुद को बड़ा ही निम्न दर्जे का सोचता था , मेरी कल्पनायें हमेशा शहरी जीवन को पाने की होती थी ,तब मेरी नजरो में शहरी जीवन जीने वाले लोग बहुत ही खुश और आमिर होते थे
इसलिए मेरी इच्छाये हमेसा शहरी जीवन को पाने की रही ,
लेकिन आज में देश विदेश का और बड़े बड़े शहरो का अनुभव करने के बाद सोचता हु कि तब में कितना गलत था ,
किसान अमीर हो या गरीब ये मायने नही रखता , मायने रखती हे उसकी मेहनत जब एक किसान अपने खेत में जाकर कठिन परिश्रम करता हे और उसके बाद किसी पेड़ की गहरी छांव में बैठकर विश्राम करता हे उस समय वो अपने हर कष्ट को भूलकर उस ठंडी हवा को महसूस करता हे जो उसके पसीने से भीगे बदन को छूकर निकलती हे । और वो आम के पेड़ पर लटके फलो की खुशबु सोने में सुहागे का काम करती हे , उस प्राकृतिक सुगंध के  सामने मानो दुनिया के सारे एयर फ्रेशनर शून्य हो ,अतः वो आनंद किसी आत्मिक सुख से कम नही होता AC की हवा भी उतना आनद नही देती ,
किसान वास्तव में अन्नदाता होता हे
गर्मी ,शर्दी,बरसात हर मौसम के होने वाले झमेलों से अपनी जान की परवाह किये बगैर अपनी फसल को एक बच्चे की तरह पालता हे , और उस फसल को पाल पोषकर वो उन शहरी लोगो को सौंप देता हे जो उसे निम्न और हेय दृष्टी से देखते हे । इसलिए सच कहु तो एक किसान से राईस और अमीर इंसान इस दुनिया में कोई नही
वो भले ही कच्चे और छोपडी नुमा घर में क्यों न रहता हो......


आख़िर ज़ीवन है क्या ?

 एक लंबे समय बाद आज कुछ लिखने का मन है मुझे नहीं पता था की आज भी कुछ लोग मेरी विचारधारा को उतना ही पसंद करते है जितना पहले पसंद किया करते थे...