में बचपन से अपने कृषक जीवन को बड़ी ही निम्न दृष्टि से देखता था , मेरे पिताजी पैशे से किसान ही थे और अभी भी हे इसलिए बचपन में किसान का बेटा होने के कारण कभी कभी खुद को बड़ा ही निम्न दर्जे का सोचता था , मेरी कल्पनायें हमेशा शहरी जीवन को पाने की होती थी ,तब मेरी नजरो में शहरी जीवन जीने वाले लोग बहुत ही खुश और आमिर होते थे
इसलिए मेरी इच्छाये हमेसा शहरी जीवन को पाने की रही ,
लेकिन आज में देश विदेश का और बड़े बड़े शहरो का अनुभव करने के बाद सोचता हु कि तब में कितना गलत था ,
किसान अमीर हो या गरीब ये मायने नही रखता , मायने रखती हे उसकी मेहनत जब एक किसान अपने खेत में जाकर कठिन परिश्रम करता हे और उसके बाद किसी पेड़ की गहरी छांव में बैठकर विश्राम करता हे उस समय वो अपने हर कष्ट को भूलकर उस ठंडी हवा को महसूस करता हे जो उसके पसीने से भीगे बदन को छूकर निकलती हे । और वो आम के पेड़ पर लटके फलो की खुशबु सोने में सुहागे का काम करती हे , उस प्राकृतिक सुगंध के सामने मानो दुनिया के सारे एयर फ्रेशनर शून्य हो ,अतः वो आनंद किसी आत्मिक सुख से कम नही होता AC की हवा भी उतना आनद नही देती ,
किसान वास्तव में अन्नदाता होता हे
गर्मी ,शर्दी,बरसात हर मौसम के होने वाले झमेलों से अपनी जान की परवाह किये बगैर अपनी फसल को एक बच्चे की तरह पालता हे , और उस फसल को पाल पोषकर वो उन शहरी लोगो को सौंप देता हे जो उसे निम्न और हेय दृष्टी से देखते हे । इसलिए सच कहु तो एक किसान से राईस और अमीर इंसान इस दुनिया में कोई नही
वो भले ही कच्चे और छोपडी नुमा घर में क्यों न रहता हो......



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