Wednesday, 31 May 2017

मेरा फैलो ट्रैवलर


मेरा फैलो ट्रैवलर *

कल मेने डेल्ही से मुज़फ्फरनगर के लिए साढ़े ग्यारह बजे अमृतसर इंदौर ट्रेन पकड़ी , ट्रेन से अचानक सफ़र करना पड़ा तो जल्दी में  AC कोच की टिकिट बुक न करा सका , चमचमाती गर्मी में जनरल डब्बे की और देखने से ही उमस पैदा हो रही थी , बैठना तो बहुत दूर की बात खड़े होने तक की जगह न थी , ये सब दृश्य देखकर में आवेशित हो उठा और मन ही मन सोचने लगा की यूरोप के देश हमसे कितना आगे निकल चुके और हमारी व्यवस्था आज भी बेलगाडी की तरह हे । बस यही सोचते हुए में आवेश में आकर आरक्षित कोच में जा घुसा और सोच लिया की जो होगा देखा जायेगा , खेर में आरक्षित डब्बे में एक बुजुर्ग महिला की सीट पर जा बैठा और उसने भी मुझे वहा बैठने की अनुमति दे दी , मै अकेला बैठा ऊब सा रहा था , तभी मेरी नजर मेरे सामने वाली सीट पर बैठी एक मासूम से बच्ची पर पड़ी , में उसकी हरकतों को बड़े ध्यान से एक टक देखने लगा कभी वो सीट पर से उतरती तो कभी सीट पर ऊपर चढ़ती , एक पानी की बोतल को वो इधर उधर उठाकर फेंखते हुए मेरे पास आ गयी अचानक से उसने मुझे देखा और फिर वो एकटक मुझे देखती रही , उसके मासूम से चेहरे को मेने छूना चाहा लेकिन जैसे ही मेने हाथ आगे बढाए तो वो तुरंत पीछे की और घिसक गयी मानो जैसे किसी पुष्प ने अपने आप को पत्तियो में समेट लिया हो ,
लेकिन उसकी नजरे मुझे ही देखती रही उसकी चहल कदमी भी शांत हो गयी थी , अब हम दोनों एक दूसरे को दूर से ही देख रहे थे , बहुत देर से में यही सोच रहा था की कोई फेलो ट्रैवलर मिले तो मेरा सफ़र आसानी से कट जाए ,
खेर उस मासूम सी बच्ची को देखने के बाद मुझे अहसास हुआ की मुझे मेरा फेलो ट्रैवलर मिल गया हे ।
तभी मै अपने बेग से चने निकालकर खाने लगा , अब वो गुड़िया मुझे चने खाता देख अपनी सीट से उतरकर मेरे पास आ बैठी , वो एक टक मुझे देख रही थी उसके और मेरे बीच में चने से भरी पॉलीथिन थी वो चनो को देखती फिर मुझे देखती , उसके मासूम से और प्यारे से चेहरे को देखकर में आनंदित हो रहा था , अब हम दोनों अपनी नजरो से ही एक दूसरे से बात कर रहे थे , मानो उसकी निगाहें यही कह रही थी की क्या में भी तुम्हारे ये चने ले सकती हु ,
मै उसकी इस मासूम सी हरकत को देखकर मुस्कुराया, मेरा मुस्कुराना उसके लिए अनुमति का काम कर गया , उसने तुरंत अपने नन्हे से हाथो से चने मुट्टी में उठाये , उसकी नन्ही सी मुठ्ठी में मुश्किल से 3 या 4 दाने आये होंगे , प्रकृति की इस सुंदरता को देखकर में लोलीन हो रहा था, उसके वो हाथ चने उठाने के लिए कुछ वैसे ही खुले थे जैसे किसी बीज का भुरभुरी मिटटी से अंकुरण हो रहा हो और उसकी नन्ही कोमल पत्तिया सारे संसार को अपने आगोश में लेने के लिए खुली हो , बस प्राकृतिक सुंदरता की इस अनमोल धरोहर को में निहार रहा था , उसने जैसे ही वो चने से भरी मुठी अपने मुह की और खाने के लिए की तभी उसकी माँ ने उसे झिटक दिया और उसे मेरे पास से उठाकर अपने पास ले गयी और उसे झुंझलाते हुए उसकी सीट पर दे पटका , उसकी मुट्ठी  के वो चने जमीन पर गिर गए थे
वो जमीन पर गिरे उन चनो को देख रही थी , उसकी आँखों में एक उदासी सी छा गयी उसकी आँखे एकदम नम हो चुकी थी शायद वो अब रोने ही वाली थी तभी उसने मुझे देखा ,
मेने गर्दन हिलाई और अपनी आँखों से उसे मना करते हुए पलक झपके ,
वो रोइ तो नही लेकिन उसकी नम आँखों के दो आंशुओं को में रोक न सका , मुझे बड़ा ही दुःख हो रहा था आखिर क्या गलती थी हम दोनों की
यही की उसने मुझे अपना फेलो ट्रैवलर चुना ..?
उसके इस स्वतंत्रता के अधिकार को छीनने वाली उसकी माँ का ये कार्य आखिर कहा तक उचित था .?
उस नन्ही सी कली की इच्छाओ का दमन करने का अधिकार
आखिर प्रकृति ने तो नहीं दिया ..?

तभी उसकी माँ ने अपने बेग से एक #पूरी निकाली और उसके हाथ में थमा दी , उसे लगा की वो भूकी हे शायद इसलिए मेरे पास चने खाने चली गयी होगी , लेकिन नही उसकी माँ पूरी तरह गलत थी , उसने मुझे अपना दोस्त चुन लिया था और वो सिर्फ मुझे कम्पनी देने के लिए मेरे पास आई थी ताकि वो मेरे साथ चने खाना साझा कर सके
क्योंकि में उसका फेलो ट्रैवलर था ,
उसने उस #पूरी को हाथ में जरूर लिया लेकिन खाया नही ,
वो पूरी को अपने दांतो से काटकर इधर उधर फेंकने लगी ,
उसका खिलखिलाता चेहरा अब स्पष्ट रूप से उदास था ।
लेकिन उसकी मासूम निगाहें अब भी मुझे देख रही थी .................

चित्र सलग्न ,

---------------कुँवर मोहित राणा



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