Wednesday, 31 May 2017

ईरान की एक घटना ने मुझे सिखाया मानवता क्या होती हे



ईरान की एक घटना ने मुझे सिखया मानवता क्या होती हे ......

**********दृश्य -1***********

में भूषर से सुबह 6.30 मिनिट पर आबादान इंटरनेशनल एअरपोर्ट के लिए निकला ।
शाम 4 बजे की मेरी फ्लाईट थी ।
में अपने वतन भारत  लौट रहा था मन में एक नए उत्साह के साथ । लगभग 6 घंटे का मेरा सफर था इंटरनेशनल एअरपोर्ट तक का । इसलिए मेने सुबह 6.30 की एक लग्जरी बस पकड़ी मेरे अनुमान से उसे 1 बजे तक इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर पहुचना था । लेकिन उसका वास्तविक टाइम 7 घंटे था भूषर से आबादान तक के लिए । जब बस ने मुझे आबादान पहुचाया तो लगभग डेढ़ बज चुका था अब मुझे लगा के कही flyt न मिस हो जाए । इमिग्रेशन के लिए काउंटर पर डेढ़ घंटे पहले पहुचना पड़ता हे यानी मुझे 2.30 पर एअरपोर्ट पहुचना था ।
और बस ने मुझे एअरपोर्ट से 8 किलोमीटर पहले उतार दिया था । बस ड्राईवर ने बताया की यहाँ से मुझे एअरपोर्ट के लिए टेक्सी पकड़नी होगी ।
में टेक्सी की तलास में वहा खड़ा रहा लगभग 15 से बीस मिनिट तक।मेरी बेचैनी समय के साथ साथ बढ़ती जा रही थी ।मन में यही भय था कि flyt न छूट जाए ....... तभी मुझे एक टेक्सी दिखी मेने उसे तुरंत हाथ का इशारा किया ...उसने मुझ से पूछा कहा जाना हे मेने बताया की मेरे पास मात्र 10 या 20 मिनिट हे मुझे एअरपोर्ट पहुचा दो । उसके पास पहले से ही 2 सवारी थी जो दूसरे रुट की थी ।
उसने मुझे कहा की माफ़ करना मेरे पास दूसरे रुट की सवारी हे में नहीं जा सकता ।
यह सुनकर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा । मुझे लगा में अब हिंदुस्तान नहीं पहुच पाउँगा ।
टेक्सी ड्राईवर टेक्सी लेकर चल पड़ा ......
लेकिन कुछ दूर चलते ही उसने तुरंत गाडी बेक की और मेरी तरफ आया ।उसने अपनी पहली दो सवारी को वही उतरने के लिए बोला और कहा की पहले में इस हिंदी (यानि मुझ हिंदुस्तानी ) को
एअरपोर्ट छोड़ आउ और बाद में तुम्हे छोड़ आऊंगा तुम बस यही वेट करो ।
उसने मुझे इशारा करते हुए कहा जल्दी गाडी में बैठो , मेने तुरंत अपना लगेज गाडी में रखा और बैठ गया ।
उसने गाडी एअरपोर्ट की तरफ मोडी और चल पड़ा ....मुझे लग रहा था की शायद ये मुझसे ज्यादा किराया वसूलेगा क्योंकि इसने मेरे लिए अपनी दो सवारी को कष्ट जो दिया था।
उसने मुझसे अचानक पूछा तुम हिंदी हो ....मेने कहा हां ....फिर उस ईरानी ने हँसते हुए टूटे फड़के शब्दों में  एक हिंदी सांग गया ....डील मेले थू दीवाना हे .....।
उसने अमिताब बच्चन जी का नाम लिया और कहा की वो उसका फेवोरिट हीरो हे ।
बाते करते करते एअरपोर्ट आ गया ......मेने घडी में टाइम देखा तो समय 2.35 हो रहा था ।
मेने राहत की सांस ली और जल्दी जल्दी में उससे किराया पूछा ।
तब उस ईरानी ने दोनों हाथ जोड़कर मुझे नमस्थे कहा ....में आश्चर्यचकित रह गया ...मेने पुनः फ़ारसी में पूछा ....#सुमा_चकत_पूल_मखाय यानि (तुम्हे कितने पैसे चाहिए )
तब उसने पैसे लेने से मना कर दिया और कहा सुमा हिंदी पूल लाजिम नदारी यानि वो यही कहना चाहता था की तुम हमारे मेहमान हो और में तुमसे पैसे नहीं ले सकता इंसानियत के नाते ये मेरा फर्ज था में तुमसे किराया नहीं लूंगा तुम हँसी ख़ुशी अपने देश लोटो....उसकी ये बाते सुनकर में हतप्रभ रह गया ।
मेरे दिल से उस ईरानी के लिए सेल्यूट निकला ।
लेकिन में भी एक हिंदुस्तानी था अपना फर्ज कैसे भूल सकता था भला .? हमारे संस्कार भी इतने कमजोर तो नहीं ।
मेने पुन पुछा अच्छा ये ही बता दो की जहा से में बैठा हु वहा से यहाँ तक का कितना किराया होता हे ?
उसने मुझे हाथ खोलकर इशारा किया ..कि पाँच #खुमैनी ।

मेने कहा ठीक हे ....ये लो #दस खुमैनी ...उसने फिर मना कर दिया तब जबरदस्ती से मेने उसकी पॉकेट में 10 खुमैनी रख दी !
उसके सत्कार को देखते हुए मेने भी अपना कुछ कर्तव्य समझा और दोगुना किराया देकर एक संस्कारित हिंदुस्तानी होने का परोक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किया ।
और हर्दय से उसका आभार व्यक्त कर एअरपोर्ट की और निकल पड़ा ।

***************दृश्य - 2***************

जैसे ही में मुम्बई के इंटर नेशनल एअरपोर्ट  पंहुचा  मुझे बड़ा ख़ुशी का अहसास हुआ ।
और एक बार फिरसे उस ईरानी टेक्सी ड्राईवर को धन्यवाद दिया ...

अब मुझे एअरपोर्ट से c.s.t के लिए निकलना था ....जैसे ही में एअरपोर्ट के बहार आया तो मेने ओटो पकड़ी उससे मेने किराया पूछा तो उसने डेढ़ हजार रूपये बताया ...में हैरान रह गया क्योंकि ये बहुत ही एक्सपेंसिव था ....।

खेर एक पोलिस वाले को कहकर मेने ओटो कराया तब उसने मुझसे 150 रूपये लिए ।
अब मेने दोनों घटनाओ का तुल्यात्मक अध्यन किया ।
और पाया यदि मेरी जगह कोई विदेशी होता तो वो ओटो ड्राईवर उसकी जेब को चूहे की तरह कुतर डालता । और हर रोज विदेशियो के साथ होता भी यही हे  मुम्बई हो या डेल्ही सब जगह ..।

क्योंकि हम भारतीयो के अंदर मानवता मर चुकी हे ...वरना अतिथि देवों भवः कहने वाला देश
अपने अतिथियों के साथ ऐसा व्यवहार न करता ।
मानवमूल्यों की कद्र अब भारत में न के बराबर हे सबको अपना पेट भरने की लगी हे ....चाहे दोगले नेता हो या आम इंसान ..!

लेकिन उस ईरानी ने ये जरूर सीखा दिया ...........................कि हम भारतीय अपनी संस्कृति को भूल चुके हे ..........मानवता ,इंसानियत और परमार्थ बस सब्दो में सिमट कर रह गया हे ।

शेयर जरूर करे मित्रो ताकि हमारी मरी हुई इंसानियत में थोड़ी चेतना आ सके..

-------------------------कुँवर मोहित राणा


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