Wednesday, 31 May 2017

एक इंजीनियर की पकौडी


बात उन दिनों की हे जब में सिविल इंजीनियरिंग का छात्र था,  इंजीनियरिंग करने का एक फायदा तो हे, हमे इंजीनियरिंग आये या न आये लेकिन खाना बनाना जरूर आ जाता हे ।
इसलिए मेने देखा की जो स्टूडेंट इंजीनियरिंग को अपना कैरियर नही बना पाते वो एक ढाबे या रेस्टोरेंट का संचालन अच्छे से कर लेते हे ।
अब हुआ यु हमारा भी इंजीनियरिंग का प्रथम वर्ष था होस्टल न मिलने के कारन रूम हायर करके ही रहना पड़ा , अब स्टूडेंट के सामने सबसे बड़ी प्रोब आती हे खाने की ,खाने का एडजस्टमेंट कर पाना बड़ा ही मुश्किल होता हे , खेर मेरा शौभाग्य ये रहा की मेरा एक दोस्त पास आउट था, जिस वजह से उसे खाना बनाना अच्छे से आता था , वास्तव में वो लजीज और जायकेदार खाना बनाया करता था , मेकेनिकल इंजीनियर होने के साथ साथ वो एक अच्छा कूक भी था ,इसलिए आरंभिक दिनों में मुझे खाने की ज्यादा प्रॉब्लम न हुई , सुबह शाम टाइम से मेरा दोस्त जायकेदार खाना उपलब्ध करा दिया करता था ,
अब सब कुछ सही जा रहा था कि अचानक कुछ दिन बाद उसे अपने घर जाना पड़ गया, अब खाना बनाने की समस्या मेरे सामने आ खड़ी हुई , शर्दीयो के दिन थे कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी हल्की हल्की बूंदाबांदी भी हो रही थी मेरा एक रूम पार्टनर और था जो उम्र में मुझसे बहुत छोटा था, उसने मुझसे कहा भाई चलो आज पकोड़ी बनाते हे  शर्दी हो रही हे और पकोड़ी खाने का मन हे , अब पकोड़ी का नाम सुनते ही मन में चटपटे स्वाद घूमने लगे मेने उसके सुझाव पर ISI मार्क की मोहर मरते हुए हां भर दी , और योजनाबद्ध तरीके से पकोड़ी बनाने के सामान जुटाने लगे , पिछली शाम खाना न खाया था और आज भी दोपहर हो चली थी भूक जोरो पर थी पेट के चूहे जैसे हम पर चिल्ला रहे हो "नालायको खाना तो दो कबसे भूका रखा हुआ हे" और हम जैसे उन्हें कह रहे हो शांत रहो हम एक लजीज खाने का बन्दोबस्त कर रहे हे फिर भरपेट खाएंगे ।
अब सामान की लिस्ट लिखी जा रही थी - आधी किलो बेसन 
आधा किलो आलू (पहले तो इसी बात पर बहस होती रही की पकोड़ी कम न बने ज्यादा भले ही रह जाये पेट भर के खानी हे
फिर आधा किलो पर ही सहमति बनी) ढाई सौ ग्राम प्याज , इस तरह लगभग सभी सामान नोट किये गए तभी मेने कहा अरे चटनी या सॉस भी लिख उसके बिना पकोड़ी का मजा नही आने वाले  उसने तेजी के साथ चटनी को भी ऐड कर लिया।
वैसे भी गर्मा गर्म आलू की पकोड़ी हो और साथ में खट्टी मीठी चटनी ऊपर से शुहावने मौसम में रजाई में बैठकर खाने का अपना अलग ही मजा हे ।
सामान रेड़ी करते हुए हमने आलू बेसन को काट पीटकर मिला लिया , गैस को चालु किया (अबसे पहले मेने पकोड़ी तो बहूत दूर की बात चाय तक न बनाई थी ये मेरा पहला कूकिंग का अवसर था, लेकिन में पुरे आत्मविस्वास के साथ पकोडी बनाने लगा जैसे-बहुत बड़ा अनुभव मेरे पास हो)

कढ़ाई हमारे पास थी नहीं कूकर था सो कूकर को ही पकोड़ी बनाने के लिए प्रयोग में लाया गया , कूकर को गैस पर रखते हुए उसमे सिंड्रोम सिफोला का रिफाइन्ड डाला गया   बस फिर क्या था उसमे में बेसन आलू का घोल छोड़ता गया ,
थोड़ी थोड़ी देर बाद बेसन में लिपटे आलू उठाता और कूकर में डालता जाता , लगभग डेढ़ किलो का सामान यानी बेसन आलू में उसमे छोड़ चूका , और निकालना ध्यान नहीं रहा मेने सोचा एक पार पक जाये तो सारी पकौड़िया अच्छे से एक बार ही बहार निकाल लेंगे ,
सारा बेसन आलू छोड़ने के बाद मेने सोचा चलो अब पकौड़ियों को थोडा सा हिला झूला लिया जाए ,तब मेने चमचा उठाया और कूकर में देकर जो घुमाया अब ये क्या  पूरा कूकर एक साथ मूव करने लगा ,
यानी कूकर में पकौड़िया नहीं बल्कि एक बड़ा पकोड़ा था  अब ये क्या हो गया .? हमने तो पकोड़ी बनाई थी लेकिन। ये कोनसी पकोड़ी हे .? कूकर को गैस पर से उतार कर बहार उजाले में लाकर देखा तो पाया जैसे कूकर के अंदर पकौड़ियों का राजा अपना पिछवाडा जमाये बैठा हो , 
पुरे कूकर में डेढ़ किलो की एक पकोड़ी थी , अब में करता भी क्या अबसे पहले ससुरा चाय तक न बनाई थी , खेर जो भी हो भूक जोरो पर थी एक युक्ति दिमाग में आई क्योंकि न इस पकोड़े को तोड़फोड़कर बहार निकाले और फिर खाये ,
हम दोनों जैसे चट्टान को तोड़ते हुए छोटे छोटे पथरो को अलग करने लगे , अब जैसे ही उसे चख कर देखा तो लगा कि गयी भैंस पानी में , बेसन तो ठीक लेकिन आलू अंदर से एकदम कच्चे और बकबके थे , बड़ा ही दुःख हुआ सारी चटपटी योजना पर पानी फिर गया , जैसे गत लोकसभा चुनाव में कोंग्रेस ने बीजेपी के हाथो करारी शिकस्त खा ली हो , हम भी अपने उस कूकर को उठाकर पड़ोस में आंटी जी की गांय की खोर में डाल आये एक बार तो गांय ने हमारी तरफ देखा लेकिन जैसे ही जीभ से उन पकौड़ियों को चाटा उसके बाद तो सारा चट ही कर दिया हम दूर खड़े उसे देखते रहे और अपनी खट्टी मीठी चटनी और पकौड़ियों के स्वप्न को बुनते रहे, पेट के चूहे तो अब उछल कूद करके मर चुके थे , बड़ा बुरा श्राप दिया उस दिन ससुरो ने ,
पेट के चूहों की हत्या का कारण आखिर हमारी अज्ञानता ही तो थी ,

आज भी कभी कभी शर्दीयो में उन चटपटी पकौड़ियों का स्मरण हो आता हे ।

-----------------कुँवर मोहित राणा


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