कल में इंदौर उज्जैनी एक्सप्रेस ट्रेन में गाजियाबाद से मुज़फ्फरनगर जा रहा था ,
तभी एक ऐसा वाक्या मेरे सामने घटा जिसे देखकर में दंग रह गया , हुआ कुछ यु की मै ट्रेन की साधारण बोगी में सफ़र कर रहा था ,और औसतन सभी एक्सप्रेस ट्रेन की साधारण बोगियों में भीड़ अधिक रहती हे ।
बस मेरे उस डब्बे में भी भीड़ बहुत थी , सीट पर बैठने की तो बहुत दूर की बात खड़े होने में भी बहुत मुश्किल से जगह मिल पा रही थी , मै एक हाथ से ऊपर की सिट को पकड़े गर्दन झुकाये खड़ा था ,तभी मेरी नजर एक आदमी पर पड़ी,
चूँकि उसके अंदर एक बेचैनी सी थी उसकी विचित्र सी हरकते में तिरछी नजर गाढ़े हुए देखने लगा, उसके पहनावे को देखकर लग रहा था की वो ठीक ठाक परिवार से हे, दिखने में वो जेंटल इंसान एक रिबन का चश्मा अपनी वी सेफ बनियान पर आगे की और लटकाये हुए था , उस ट्रेन में सभी यात्री लगभग अपनी कशमकश में व्यस्त थे , तभी उस जेंटल इंसान ने एक ऐसे कार्य को अंजाम दिया जिसे देखकर में दंग रह गया ,
उस इंसान ने अपने पास में खड़े एक यात्री का फोन धीरे से चुरा लिया, और झट से स्विच ऑफ़ करते हुए उसे अपनी जीन्स की पेंट के अंदर ठूंस लिया , शायद अपने अंडर वियर में ।
में पहले नींद भरी आँखों से उसे देख रहा था , लेकिन जैसे ही उसने इस घटना को अंजाम दिया मेरी चेतना अचानक से सजग हो गयी , में बड़े ही विस्मयी मुद्रा से उसे देखने लगा उसकी इस हरकत को देखकर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था , खेर में कर भी क्या सकता था , क्योंकि जिस महापुरुष के साथ ये घटना घटी उन्हें अब तक इस बात का अनुमान तक न था , फिर मैने सोचा में ही उड़ता तीर क्यों लू ? जब उसे पता चलेगा तब की तब देखी जायेगी बस यही सोचकर में उसे सिर्फ देखता रहा ,
अभी 5 ही मिनिट हुई थी की जिसका फोन चोरी हुआ था उसने अपनी बाई जेब पर हाथ रखा तो वो अचानक से चोंक पड़ा उसने तेजी के साथ अपनी दोनों जेब चेक की तो पाया फोन गायब हे, उसने जोर से हल्ला किया "भाईसाब मेरा फोन चोरी हो गया , इधर उधर देखता हुआ भौचक्का सा हो गया। डब्बे की सभी सवारी अगल बगल देखने लगी , तभी वो जेंटल इंसान जिसने फोन चुराया था , उस व्यक्ति के पास आया और बोला आप चिंता मत करो आपका फोन इसी डब्बे में हे , आप बस ये बताओ की लास्ट टाइम आपने फोन को कब अपनी जेब में रखा था , ट्रेन में चढ़ने से पहले या ट्रेन में चढ़ने के बाद ?
तब उसने कहा की भाई ट्रेन चलने के बाद तक फोन मेरे पास था लगभग 20 मिनिट भी नहीं हुई होंगी जब मेने फोन को अपनी जेब में रखा था ,
तब वो चोर बोला की बस तो चोर इसी ट्रेन में हे क्योंकि ये ट्रेन अब मेरठ ही रुकेगी , गाजियाबाद के बाद इसका पहला स्टेशन वही हे ।
चोर ने उसे कहा चलो हम दोनों मिलकर सबकी तलासी लेते हे ,
क्योंकि अभी तक ट्रेन का कोई भी स्टोपिज नहीं आया , चोर इसी में हे ,खेर आपका फोन कोनसा था .? चोर ने उससे पूछा तब उसने कहा भाई बीस हजार रूपये का सेमसंग का फोन था
चोर ने कहा ठीक हे चलो तलाशी लेते हे सबकी , जिसका फोन चोरी हुआ था उसने भी हां करते हुए तलासी लेनी शुरू कर दी ,
दोनों सवारियो की तलासी लेने लगे , एक एक करते हुए तलाशी देने का नम्बर मेरा आ गया, (जो इस घटना को आरम्भ से देख रहा था )उस चोर ने मुझसे कहा भाईसाहब अपनी तलाशी दीजिये ,इसलिए थोडा सीधे खड़े हो जाये और अपना कमर से बेग भी उतारिये , मेने सीधे सीधे उसे मना कर दिया में तलाशी नहीं दूंगा , सब सावरिया अचानक से मुझे इस तरह घूरने लगी जैसे में ही चोर हु , जिसका फोन चोरी हुआ था वो भी अचानक से मेरी तरफ लपका ।
अब उस चोर ने बड़ा एटिट्यूड दिखाते हुए मुझे कहा तू अपनी तलाशी क्यों नहीं देगा बे .?
इतना सुनते ही मेने अपने दांये हाथ से एक तमाचा उस चोर की कनपटी पर रसीद कर दिया ,
उसने मुझपर हमला किया मेने दूसरे बांये हाथ से फिर एक और तमाचा उसकी कंसरि पर सूत दिया ,
जिसका फोन चोरी हुआ था वो भी बड़े गुस्से के साथ मुझ पर टूट पड़ा तब मेने कहा सुन भाई तेरा फोन अभी देता हु , मुझे गलत मत समझ ।
वो एकाएक रुक गया , अब मेने उस चोर का गिरेबान पकड़ा और कहा चल इसका फोन दे , ये सुनते ही सभी यात्री चोंक पड़े , और वो चोर बोला भाईसाहब मेरे पास फोन नहीं हे।
खेर दो तमाचों का असर इतना तो हुआ की वो बे से भाईसाहब पर आ गया , मेने उसे फिर कहा यही देगा या पोलिस स्टेशन में जाकर ? तब उसने अपनी गर्दन को झुकाते हुए अपनी पेंट के अंदर से फोन निकाला और बोला plz भाईसाब मुझे पोलिस में मत देना ये मेरी बहुत बड़ी गलती थी मुझे खुद महसूस हो रही हे माफ़ कर दो plz वो बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा ,
ये सब देखकर लगभग सभी सवारी उस चोर के खेल को समझ चुके थे ।सभी सवारियो ने कहा नहीं ...इसे पोलिस को दे दो ,
जिसका फोन चुराया था वो भी पुरे गुस्से में उसपर आगबबूला हो रहा था ,उसने उसे कहा तुझ जैसे चोरो की जगह जेल ही हे में अभी पोलिस को फोन करता हु सब कहने लगे हा करो करो ....
पता नहीं क्यों ये मुझे अच्छा नहीं लगा मेने उसका फोन पकड़ते हुए कहा जाने दो ,तुम्हारा फोन मिल गया यही बहुत बड़ी बात हे बाकी इसके कर्म इसके साथ तुम मुझे धन्यवाद देना चाहते हो तो इसे छोड़ दो , (मै अपनी ब्लैक कलर की राजपुताना ब्रेण्ड वाली हूडी पहने हुए था जिस पार आगे *जय राजपुताना* और पीछे #क्षत्रिय लिखा था ।)
तब उसने मुझसे कहा "ठीक हे ठाकुर साहब आपके कहने पर इसे छोड़ दिया मेने"।
अब मेने उस चोर को कहा कि तुम्हारी उम्र तीस पैंतीस साल की होगी तुम्हे शर्म आनी चाहिए ऐसा घिनोना काम करते हुए ।
उसने सिर्फ इतना कहा थैंक्यू छोटे भाई ।
मेरठ स्टेशन आ गया था ट्रेन धीमी ही हुई थी की वो उतर गया ।
सबने मुझे बहुत सराहा और कहा बहुत बढ़िया ठाकुर साहब सच में मुझे कल बहुत गुड़ फील हुआ ,
लेकिन एक बात खटकती रही कि मेने उस चोर को यू ही छोड़ दिया, ये गलत किया या सही ..??
---------------------------कुँवर मोहित राणा











